सोमवार, 22 जून 2009

स्वप्न की कल्पना के बाहुपाश मे होता है प्रिये हकीकत के दृश्यों का सृजन

हमारी
आँखे जो देखती
जग के दर्पण मे
मन तद अनुसार सोचता है जो क्षण -क्षण मे
तब
बहुत सावधान रहना पङता है
क्योकी
कभी फूल कांटा नजर आता है
और
काँटा फूल ....अपने अंहकार के भरम मे
सचमुच मे
सच ,सच सा कैसे लगे
प्यार से पहले भर लेना नजरो को
फ़िर
करीब जाकर छू लेना जैसे ख़ुद को
उसका रूप
उसका आकार नही
उसकी तड़फ देखना
उसकी आँखों मे
दर्द की बहती पुरानी नदी देखना
हकीकत के पास न देह है न मन
केवल है एक प्रेम मय समर्पण
तू अगर हकीकत है
तो मै हूँ तेरा सुंदर सपन
स्वप्न की कल्पना के बाहुपाश मे
होता है प्रिये -
हकीकत के दृश्यों का सृजन

{किशोर }

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