मंगलवार, 16 जून 2009

तुम्हारे हर ख्वाब का मै हूँ प्रिये दृश्यांकन

जिसे पुकारता है तुम्हारा मन

मै वही हूँ तुम्हारा अदृश्य सजन

ओढ़कर जिसे सोता है तुम्हारा स्वप्न

वही चादर नींद की मै हूँ गहन

जिसकी महक से घिरी रहती हो

तुम्हारे दिल के बाग़ मे खिला वो एक हूँ सुमन

तुम्हारा छूता हूवा बचपन

और शेष रह गया हूँ यौवन

जी लो मुझे मै तुममे ही हूँ

उपस्थित ओ मेरे सुंदर प्रीतम

प्यार के मीनार की उचाई हूँ

हूँ हमारे जन्मो के रिश्ते के किले का अमित रंग

संगमरमर के फर्श सा

इंतजार मे तेरे अब तक बिछा था

आओ चल लो मेरे संग अब हरदम

तुम्हारे हर ख्वाब का प्रिये मै हूँ दृश्यांकन

{किशोर }

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