रविवार, 21 जून 2009

बिना शरीर का मन

हम पहली बार मिल रहे थे ,

सूरज दिन भर थक कर अब विश्राम करने की तैयारी मे था ,

शाम होने का यह धुंधला होता हूवा या कहे दिन का ओझल होता हूवा -यह दृश्य

बहुत ही प्यार से भरा होता है

लोग जोडियों मे शहर से दूर इस नदी के तट पर नाव मे बैठ कर छोटी सी यात्रा के लिए

यहाँ रोज पहुच ही जाते है


जल मे लहरों ने तुम्हारी उभर आयी परछायी को मिटा दिया था

मुझे दुःख हूवा

नाव पर बैठी हुवी तुम मेरे करीब थी

संध्या की सुनहरी किरणों से उसका चेहरा दमक रहा था ,वह ऊपर से शांत लग रही थी

लेकीन उसका शरीर दहक रहा था

काले रंगके आँचल से ढके सिर से मुझे उसका गोरा मुखडा बस दिखायी दे रहा था

मुझे लगा की मै उसे चूम लू


मै सोचने लगा क्या एक दिन वह भी आयेगा जब ..हवा की नदी मे पत्तो सा तैर रहे हम दोनों को

एक तेज झोका इसी तरह मिटा देगा


मुझे फ़िर दुःख हुवा ,मै उसके और पास सरक गया ,क्योकी मै उसे किसी भी हालत मे खोना

नही चाहता था ..चाहे कई जन्म लग जाए


वासना ,देह तक सिमित होती है लेकीन प्यार मे आत्मा के साथ -साथ देह ,मन सब शामिल होते है

यह सच भी सबको पता होना चाहिए


खैर मै उसकी उपस्थिति को इस धरती पर महसूस कर लेना चाह रहा था

उसने भी मुझे छूकर देखा जैसे मै वाक्य हूँ या नही

मनुष्य का जीवन तिनके की तरह है ,पतवार की वार से कौन सा तिनका किस दिसा मे बह जाए

कौन किससे बिछड़ जाए .....कोई नही जानता


सब अनिश्चीत है

लेकीन ताज्जुब है हम सब कितने निशचिंत हैं

मै हमेशा रहूंगा का भावः ही तो जीने की मूल प्रेरणा है

शाम के इस क्रमश: गाडे होते जा रहे काले रंग मे हम दोनों भी दो स्लेटी धब्बो की तरह

आपस मे घुल jaanaa चाह रहे थे



कोई टिप्पणी नहीं: