मंगलवार, 9 जून 2009

कवि और कविता

१-कवि तन्हा नही आया था
सात अक्टूबर की शाम
जलना था रावणको आज
ठीक इसी दिन चार साल बाद
कविता जन्मी थी प्रात
लक्ष्मी आयी हो ले धन अपार

२-अनेक जेठ अषाढ़
बीत गए फ़िर
बसंत माघ

३-घोसलों के अन्नत तिनके
बिखरे हजारो बार
फ़िर जुड़ गए लिए nayii उड़ान

४-महानदी हो या हुगली
दोनों सागर तक फैली
धान उगा खेतो मे
बहा ले गए सब खार

५-गाँव कवि का वही रहा
बबूल काँटों को सता रहा

६-शहर कविता को पढाता गया
कविता मे निखर आता गया

७-जलते दियो सा -
जग के अंधियारे मे
धुदते रहे एक -दुसरे का चेहरा
हर धूमिल आईने मे


८-कभी लगता
नदी की गहराई सा
उन्हें कोई पुकार रहा

९-या
सुने मे कोई नूर
उन्हें बुला रहा

१०-कभी लगता कोई पन्ना
प्यार अमर सिखला रहा

११-चलते -चलते पावो को सुर खीचते
दूर कही बांसुरी मक्नो कोई बजा रहा

१२-फ़िर एक दिवस ऐसा भी आया
काल मयूर ने मोहक नृत्य दिखलाया
आषाढ़ के बदल छंटे
सरसों सा खिलकर पुलकित उनके दिल हँसे

१३-अब दोनों सदैव -बसंत है
मधुर तट पर
प्रेम लहरों मे दुबे
एक जोडी आलिंगनबद्ध शंख है

{किशोर }

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