सोमवार, 15 जून 2009

संग तुम्हारे ही रहता हूँ

मै
तुम्हे
खोजता बैठा रहा
हर प्लेटफार्म मे
हर ट्रेन मे धुड़ता रहा तुम्हे

हरी -हरी पत्तियों से
भरी टहनियों पर
बैठे
पंछियों के कलरव
मे गूंजता रहा
तुम्हारा नाम,

सुदूर आकाश मे
सूर्यास्त होने के पूर्व
बादलो से झांकती रही
तुम्हारी
स्वर्णीम आभा

तुम हर जगह थी
मेरे भीतर
और
बाहर कर हर दृश्य मे
हर बोल मे
मै
अब तुम्हे ही
देखता हूँ
सुनता हूँ
संग तुम्हारे ही रहता हूँ

{किशोर }

2 टिप्‍पणियां:

Pyaasa Sajal ने कहा…

bahut achhi rachna hai..shuruvaat khaaskar...chhote chhote vaaky achhe lage...kuch spelling mistakes ho gaye hai dekh lijiyega


www.pyasasajal.blogspot.com

kishor kumar khorendra ने कहा…

payasa ji shukriya