रविवार, 28 जून 2009

वोएक शाम

वो एक शाम
आकाश पर
बादलो के झरोखे
से झांकता
किरणों का सुनहरा जाल

वो एक शाम
हरी पत्तियों के
रंगों को ओढ़कर खड़े
हलकी ठंडी स्वर्णीम धुप मे
नीम पीपल के शाख

वो एक शाम
चिडियों सा फुदकता
खुशी के अक्षरों से भरा
आसमान की छत तक
उड़ने को आतुर लगता
प्रिये तुम्हारा नाम

वो एक शाम
मै ठहरा सा
विस्तार की
लम्बी पटरियों से लौटती
सुदूर से आती
किसी ट्रेन का
जिसमे तुम शायद बैठी हुवी हो
सोचकर
एकटक
निहारता कर रहा था इन्तजार

वो एक शाम
तुम्हे याद कर्ता जान
लौटने से पहले
मुझसे पूछकर
उस
अब
स्थिर से रह गए
शीतल सुखद दृश्य ने
लिख लिया था
दर्द
समय की नोक से गोदकर
वह अपनी एक दाल

{किशोर कुमार बुबू खोरेन्द्र }

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