मंगलवार, 16 जून 2009

कईजम -जन्मान्तर का लगाव

तुम कविता हो

और मै ...कविता सा रह गया हूँ

मेरे लियें कोई शहर है

अब न कोई गाँव

मै रहता हूँ जहाँ

वह है बस -तुम्हारे प्यार की छाँव

तेरी याद मे जीता हूँ

तेरे जादुई स्पर्श को हर कदम पर

महसूस करते है मेरे पाँव

यकीन तो तुम्हे भीहै

तुम्हारी आँखों से साफ़ झलकता है

मेरे लिए तीव्र बुलाव

कभी-कभी लगता है उड़कर आ जाऊ

और बैठ जाऊ तेरे ख्यालो के मुंडेर पर

फ़िर महसूस करू तुम्हारी नर्म हथेलियों का सहलाव

तुम्हारे शहर का न तुम्हारे नाम का पहले पाता था मुझे

वरना इतने बरसो उम्र के न जीते मेरे सभी पड़ाव

क्या काहू कुछ समझ मे नही आता

यह तेरा सम्मोहन है या कई जन्म -जन्मान्तर का लगाव

{किशोर }

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