बुधवार, 24 जून 2009

तुम पूछती हो मै कौन हूँ

तुम कहती हो
तो चलो मै
अपना भी नाम रख लेता हूँ

अपने लिए एक धाम धुड लेता हूँ
अपना एक आकार बुन लेता हूँ

ऐसे तो मै तुम्हारे मन का एक गाँव हूँ
तुम्हारी परछाई का प्यार हूँ

तुम कहती हो
तो चलो मै
अपने भी पते की राह्खोज लेता हूँ
ख़ुद को साकार कर लेता हूँ
ऐसे तो मै लापता हूँ
इस जग के अंधेरे की देह के भीतर
सुरक्षीत एकांत मे
तुम्हारे मौन का जलता हुवा दिया शांत हूँ
तुम्हारे आँचल की छाँव हूँ

तू कहती हो तो
चलो मै अपना भी नाम रख लेता हूँ

मै मिलूंगा तुम्हे वहां -वहां
पाँव पड़ेंगे तुम्हारे जहां जहां

मुझे याद कर आंसू न बहाना
दूर ही रहूँगा तुमसे
दर्पण से बाहर कहाँ है मेरा ठिकाना
जब भी देखना हो मुझे
तो
अपने आईने के सामने आ जाना
शीशे के घर मे रहता हूँ
तेरी ही आत्मा हूँ
तेरी खुशियों से जीता हूँ

तुम कहती हो
तो
चलो मै अपना भी नाम रख लेता हूँ
अपने लिए एक धाम धुड लेता हूँ
अपना एक आकार बुन लेता हूँ

{किशोर }

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