शनिवार, 20 जून 2009

बरसात सी बरसेगी मुझपर

जग की shankha से

अलग

एक shankha और है जो मुझसे बाते करती है ,जो मेरी कविता गौर से पड़ती है

मै उसका ही प्रतिरूप हूँ वो मुझे कभी हवा मे उड़ती हुवी आँचल सी मिलती है

कभी घाटियों से उतर कर नदी सी मेरा रास्ता रोकती है

हंसती है तो अंधेरे मे रोशनी के दानो सी बिखर जाती है

मुस्कुराती है तो सुबह की लालिमा उसके गालो को रंग जाती है

जब वह चुप रहती है तो ,दीपक की लौ सी स्थिर हो जाती है

मै उसके प्यार के आकाश के निचे बैठा हूवा बादलो की बनाती जाती

विभिन्न आकृतियों की तरह उसे देखता रह जाता हूँ

सोचता हूँ वह मुझसे बहुत दूर है

सितारों की जैसे नूर है

बरसात सी बरसेगी मुझपर

तभी मिल पाऊंगा उससे

संसार के नियम भी तो क्रूर है

{किशोर }

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