शनिवार, 13 जून 2009

आओ मुझे अपनी बाहों मे भर लो

नदी के

के इस पार

शब्दों का मेला है

कोई तुम्हे -

पुकार रहा -माँ

दीदी

पत्नी

दोस्त

प्रेमिका

इस भीड़ के लिए तुम

देह के दर्पण

का

अलग -अलग

हिस्सा हो

किसी के लिए बिंदिया

किसी के लिए राखी हो

आँचल मे प्रसाद सा भरा प्यार

सभी को चाहिए

कुत्तुश को भी -

लेकीन किसी के लिए वैशाखी हो

फिरभी -अपनी सम्पूर्णता के

महा एकांत मे

उस निर्जन मे

नदी के उस पार

मै कह रहा हूँ

आओ मेरे पास

मै हूँ सम्बंधोसे परे

एक

शब्द -केवल प्यार

तुम्हारी चेतना

तुम्हारा जागरण

तुम्हारा स्वप्न

तुम्हारी जड़ ,

पूर्ण साकार चंदन सा महकता

वन मै ही हूँ

आओ

मुझे अपनी बाहों मे भर लो

{किशोर }

मै ही भरा हूँ

2 टिप्‍पणियां:

Mrs. Asha Joglekar ने कहा…

अंतस में उतरने का बहुत सुंदर प्रयास.

kishor kumar khorendra ने कहा…

asha joglekar ji shukriya