बुधवार, 24 जून 2009

नदी और मै

नदी का संदेश
बाढ़ की तरह
मुज तक आ गया

बाढ़ ने कहा
चलो मेरे साथ बहना है

मैने कहा -
कविता की आखरी लाइन तो लिख लू

बाढ़ ने कहा -
नदी की मांग मे सिंदूर
कविता से नही
अपने प्रेम से भरना है

हां तुम उसकी वेणी को सजाने के लिए
अपनी कविता से
शब्दों के कुछ फूल मांग लो
साथ मे रख लो कम आयेंगे

संदेश दुनिया घूम चुका था
मैने पूछा -
नदी से यह मेरी
पहली मुलाकात है
फ़िर मेरी भाषा
और
उसकी बोली मे भी अन्तर है

उसने कहा -
तुम्हे वहा जाकर बोलना नही है

बस अपनी आँखों से
नदी के मदभरे नयनो को देखना है
प्रेम की यही भाषा है

तभी
मेरे सामने
कोहरा आ गया

कोहरे से बने घूँघट
को मैने अपने हाथो से हटाया
अब
समक्ष इठलाती हुवी नदी बह रह थी
वह संपूर्णतः यौवन पर थी

और उसे जाना भी था बहुत दूर
उसकी यात्रा भी लम्बी थी

मै नदी की बहू की मंझधार मे था

वैसे भी मुझे तैरना आता नही
मैने जैसे तैसे
फूलो सहित उसके के गूँथ दिए

नदी की आँखे भर आयी
और मुझे
उसकी मांग मे सिंदूर भरने के लिए
अब
प्यार की इस महानदी मे ....
सप्रेम डूबना ही था
संग आजीवन बहना ही था

{किशोर }

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