मंगलवार, 23 जून 2009

गहन प्रेम

तपते धुप से भरे इस आँगन मे
लगातार
छाया की तरह
वह बन रही है मेरे लिए एक वृक्ष

नर्म हरी घास की तरह चलकर
मेरे पावो को छू रही है

नदी के पानी की तरह मेरे भीतर बहकर
मेरी प्यास बुझा रही है

मन के इस दर -के हुवे
कांच को अपनी गरिमा से जोड़ रही है
वह केवल प्यार के लहरों की उंगलियों
सी मुझे छू रही है

इसलिए
मैने उधार मे दे दिया है
उसे एक मधुर चुम्बन

वह सम्पूर्ण ज्ञान की वृक्ष है

और मुझे ज्ञात है
किसी उजियालीरात मे
chhand के katore मे
भरा huva मिलेगा
saundry kaa sty
यही to है गहन प्रेम kaa priye लक्ष्य

{KISHOR }

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