बुधवार, 10 जून 2009

शब्द और रंग

तुम

अपने चित्र के लिए

जहाँ से लाती हो रंग

मै भी

वही से लता हूँ

कविता के मुक्त छंद


निशा के गहन तिमिर मे

घेरती है तुम्हे आकर

जब

ज्योतिर्मय काल्पनिक आकृतिया

तब

तुम चाहती हो

जग की सारी रोशनी को उडेल

बना लू

एक चित्र सुंदर अखंड


उसी समय मुझे

बिठा अपने समीप

कविता कहती लिखो

एक गीत प्यार भरा

वरना रूठ जाउंगी

भूल गए क्या तुम

मुझसे अपना अनुबंध


साथ साथ रचता

यह विश्व प्रतिपल

दोनोंके मन को

कर सम्मोहित

एक शब्द मै बनता

उसी क्षण बनती तुम

सब रंगों से मिश्रित एक बूंद

फ़िर

फैलकर कागज पर

संवर आती

सचित्र

अमित रूप लिए नवरंग


{किशोर कुमार }

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