मंगलवार, 9 जून 2009

और तुम्हारे

मै
एक कवि हूँ
जो देखता हूँ
लिख देता हूँ
लेकिन
उसे कोई पढ़ता है या नही
मुझे नही मालूम
जैसे
शरीर मरता है सब जानते है
परन्तु
मन -पल भर मे
कितने बार
मरता है या जीता है
इसे कोई नही जानता
सिवा -मेरे
ईश्वर के
और
तुम्हारे

मेरे फूल से शब्द
या
मेरे कांटो से अक्षर
कभी -कभी
मेरी आँखों मे -मोटी से चमकते है
या आंसू से उतरते है
केवल
मै
या ईश्वर
या तुम बस -जानती हो
क्योकि -मै तुमसे प्यार करता हूँ
और तू मुझसे ....

{किशोर कुमार }

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