रविवार, 21 जून 2009

बिना शरीर का मन -2

धीरे धीरे नाव अब नदी के मंझधार की ओर बढ़ रही थी
सारा परिवेश श्याम और सिंदूरी रंग से भर गया था
हम दोनों सोच रहे थे
क्या ऐसा नही हो सकता की हम दोनों आज के इस संयोग को
दिन
माह
बरस ...फीर अन्नंत जन्मो के लिए संजो कर रख सके

यदी मै और वह मिलकर भी "प्यार की सबसे लम्बी रेखा खिचे " तो भी मृत्यु के हाथो
भविष्य मे किसी एक दिन अलग होना ही पडेगा -इस भौतिक शरीर का या साकार मिलन का
औचित्य क्या है ....यह केवल परिचय का माध्यम है बस
प्रेम की गंगा तो मन मे बहती है

उसने मेरी आँखों को चूम लिया
वह भी यही सोच रही थी ...ट्रेन मे मिले दो यात्रियों की तरह ...बिछड़ने के बाद भी
क्या उस परिचय को हम प्रेम मे बदल सकते है

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