रविवार, 28 जून 2009

वोएक शाम

वो एक शाम
आकाश पर
बादलो के झरोखे
से झांकता
किरणों का सुनहरा जाल

वो एक शाम
हरी पत्तियों के
रंगों को ओढ़कर खड़े
हलकी ठंडी स्वर्णीम धुप मे
नीम पीपल के शाख

वो एक शाम
चिडियों सा फुदकता
खुशी के अक्षरों से भरा
आसमान की छत तक
उड़ने को आतुर लगता
प्रिये तुम्हारा नाम

वो एक शाम
मै ठहरा सा
विस्तार की
लम्बी पटरियों से लौटती
सुदूर से आती
किसी ट्रेन का
जिसमे तुम शायद बैठी हुवी हो
सोचकर
एकटक
निहारता कर रहा था इन्तजार

वो एक शाम
तुम्हे याद कर्ता जान
लौटने से पहले
मुझसे पूछकर
उस
अब
स्थिर से रह गए
शीतल सुखद दृश्य ने
लिख लिया था
दर्द
समय की नोक से गोदकर
वह अपनी एक दाल

{किशोर कुमार बुबू खोरेन्द्र }

गुरुवार, 25 जून 2009

जीवन के पहाड़ पर

जीवन के दुर्गम
पहाड़ पर
सीडियो की तरह चढ़ रहा हूँ

लोग एक एक के
वृक्षो की तरह पास आ रहे है
पत्तियों के रंग सी उनकी खुशिया
टहनियों के स्पर्श सी उनकी कामनाये
बैठे हुवे या लुडके हुवे चट्टानों से
बनी आदीम प्रतिमाओ सी उनकी धारणाये


जीवन के पहाड़ पर jitnii तेजी से दौड़ता हूँ
उतना ही दूर दूर होता जा रहा है
लक्ष्य का शिखर
पहाड़ की पीठ पर भी भीड़ की सतह की खामोशी सी
फैली है मौन के वृक्षो की घनी विस्तृत छाहे

लेकिन pahaad की चोटी
और
मेरे बिच
तुम्हारा ख्याल -किसी शीतल प्रपात की dhaaraa की तरह
बहता रहता है निरंतर
बना रहता है हरदम

शीखर के praangan से
जो नदी की धार अमृत सी बह निकली है
उसके समीप स्थित
जीवन के इस उच्चतम शीर्ष पर
पहु -चने के पश्चात
मै चाहता हूँ
मै चाहता हूँ
सुखमय रहे सबकी यात्रा
कोई भूखा न रहे
सबको मिलता रहे पेट भर खाना
प्यार सब करे
आपस मे सीख जाए
हिल मिल कर रह जाना

{किशोर }

बुधवार, 24 जून 2009

नदी और मै

नदी का संदेश
बाढ़ की तरह
मुज तक आ गया

बाढ़ ने कहा
चलो मेरे साथ बहना है

मैने कहा -
कविता की आखरी लाइन तो लिख लू

बाढ़ ने कहा -
नदी की मांग मे सिंदूर
कविता से नही
अपने प्रेम से भरना है

हां तुम उसकी वेणी को सजाने के लिए
अपनी कविता से
शब्दों के कुछ फूल मांग लो
साथ मे रख लो कम आयेंगे

संदेश दुनिया घूम चुका था
मैने पूछा -
नदी से यह मेरी
पहली मुलाकात है
फ़िर मेरी भाषा
और
उसकी बोली मे भी अन्तर है

उसने कहा -
तुम्हे वहा जाकर बोलना नही है

बस अपनी आँखों से
नदी के मदभरे नयनो को देखना है
प्रेम की यही भाषा है

तभी
मेरे सामने
कोहरा आ गया

कोहरे से बने घूँघट
को मैने अपने हाथो से हटाया
अब
समक्ष इठलाती हुवी नदी बह रह थी
वह संपूर्णतः यौवन पर थी

और उसे जाना भी था बहुत दूर
उसकी यात्रा भी लम्बी थी

मै नदी की बहू की मंझधार मे था

वैसे भी मुझे तैरना आता नही
मैने जैसे तैसे
फूलो सहित उसके के गूँथ दिए

नदी की आँखे भर आयी
और मुझे
उसकी मांग मे सिंदूर भरने के लिए
अब
प्यार की इस महानदी मे ....
सप्रेम डूबना ही था
संग आजीवन बहना ही था

{किशोर }
आकाश से अमृत की हुवी वर्षा
धरती का भी मन हर्षा
बूंदों का संगीत सुनकर
हवा ने आँचल उसका
थाम छत पर
उसे खींचा सहसा
बौछार का स्पर्श पा
माटी सा उसका मन महका
भींग गयी आत्मा तक की काया
पहली बरसात की thi यह माया
मेरा मन हुवा उसे छुलू
गोद मे उठा कहु प्यारी बुबू

तुम पूछती हो मै कौन हूँ

तुम कहती हो
तो चलो मै
अपना भी नाम रख लेता हूँ

अपने लिए एक धाम धुड लेता हूँ
अपना एक आकार बुन लेता हूँ

ऐसे तो मै तुम्हारे मन का एक गाँव हूँ
तुम्हारी परछाई का प्यार हूँ

तुम कहती हो
तो चलो मै
अपने भी पते की राह्खोज लेता हूँ
ख़ुद को साकार कर लेता हूँ
ऐसे तो मै लापता हूँ
इस जग के अंधेरे की देह के भीतर
सुरक्षीत एकांत मे
तुम्हारे मौन का जलता हुवा दिया शांत हूँ
तुम्हारे आँचल की छाँव हूँ

तू कहती हो तो
चलो मै अपना भी नाम रख लेता हूँ

मै मिलूंगा तुम्हे वहां -वहां
पाँव पड़ेंगे तुम्हारे जहां जहां

मुझे याद कर आंसू न बहाना
दूर ही रहूँगा तुमसे
दर्पण से बाहर कहाँ है मेरा ठिकाना
जब भी देखना हो मुझे
तो
अपने आईने के सामने आ जाना
शीशे के घर मे रहता हूँ
तेरी ही आत्मा हूँ
तेरी खुशियों से जीता हूँ

तुम कहती हो
तो
चलो मै अपना भी नाम रख लेता हूँ
अपने लिए एक धाम धुड लेता हूँ
अपना एक आकार बुन लेता हूँ

{किशोर }

मंगलवार, 23 जून 2009

गहन प्रेम

तपते धुप से भरे इस आँगन मे
लगातार
छाया की तरह
वह बन रही है मेरे लिए एक वृक्ष

नर्म हरी घास की तरह चलकर
मेरे पावो को छू रही है

नदी के पानी की तरह मेरे भीतर बहकर
मेरी प्यास बुझा रही है

मन के इस दर -के हुवे
कांच को अपनी गरिमा से जोड़ रही है
वह केवल प्यार के लहरों की उंगलियों
सी मुझे छू रही है

इसलिए
मैने उधार मे दे दिया है
उसे एक मधुर चुम्बन

वह सम्पूर्ण ज्ञान की वृक्ष है

और मुझे ज्ञात है
किसी उजियालीरात मे
chhand के katore मे
भरा huva मिलेगा
saundry kaa sty
यही to है गहन प्रेम kaa priye लक्ष्य

{KISHOR }

प्यार के पास बहुत वक्त है

प्यार के पास बहुत वक्त है

सारी उम्र बीत जाती है

पर आदमी को प्यार के लिए वक्त नही मिलता

और जल्द- बाजी मे प्यार किया नही जा सकता

प्यार की रेल मे चड़ने के लिए कुछ मिनट काफी नही है
कभी -कभी तो पुरी उम्र तक इन्तजार
करने के बाद भी प्यार हम तक पहुचता नही
या हम ख़ुद उस तक पहुचते नही
कभी नाते -रिश्ते
कभी कारोबार
तो कभी ख़ुद का अंहकार -रोकता है हमें

संसार के इस महा समुद्र मे जाल बिछा हूवा है
प्रेम के लिए
धन के मोह रूपी इस जाल से
बाहर तो आना ही पडेगा

ताज्जुब है
मनुष्य को प्यारकरने के ही लिए ज्यादा सोचना पङता है
प्यार मे मन के भीतर एक संघर्ष है
हमेशा एक तनाव है

क्योकी
प्यार के पास बहुत वक्त है
और आदमी के पास वक्त नही है

{किशोर }

कर्म अंततः निष्काम ही होगा

सब माँ पिता
बच्चे
स्नेह से भरा अनेक परिवार
खुश होता मै
देख देख
आपस मे उनका प्यार

बछडे को दुलराती गाय
बच्चे को लिए घुमती
माँ बिल्ली चैन न पाय

पत्तो को चिकना हरा रखने के लिए
वृक्ष जड़ो से पानी पीता जाय

पति प्रेम मे डूबी पत्नी
ख़ुद को भूल सदा सुहागन कहलाय

पुत्र के लिए पिता
अपनी सारी पूंजी लगाय

प्यार सहित त्याग के अनुरूप
लेकिन जग मे प्रतिफल मिल न पाय

कर्म अंतत निष्काम ही होगा
चाहे फल पाने की कामना मन मे रह जाय

इसीलिए कहते है प्रेम वही सच्चा
जिसमे बदले मे चाह कोई न रह जाय

{किशोर }

सोमवार, 22 जून 2009

स्वप्न की कल्पना के बाहुपाश मे होता है प्रिये हकीकत के दृश्यों का सृजन

हमारी
आँखे जो देखती
जग के दर्पण मे
मन तद अनुसार सोचता है जो क्षण -क्षण मे
तब
बहुत सावधान रहना पङता है
क्योकी
कभी फूल कांटा नजर आता है
और
काँटा फूल ....अपने अंहकार के भरम मे
सचमुच मे
सच ,सच सा कैसे लगे
प्यार से पहले भर लेना नजरो को
फ़िर
करीब जाकर छू लेना जैसे ख़ुद को
उसका रूप
उसका आकार नही
उसकी तड़फ देखना
उसकी आँखों मे
दर्द की बहती पुरानी नदी देखना
हकीकत के पास न देह है न मन
केवल है एक प्रेम मय समर्पण
तू अगर हकीकत है
तो मै हूँ तेरा सुंदर सपन
स्वप्न की कल्पना के बाहुपाश मे
होता है प्रिये -
हकीकत के दृश्यों का सृजन

{किशोर }

यहाँ पर बदली छायी है

आज यहाँ पहली बरसात की शाम आने वाली है

मैने सोचा था एक गीत लिखूंगा

पानी मे भिनगा हूवा अपना प्यार

तुम्हे भेजूंगा

पर तुमने तो पहले ही सब पानी कर दिया

वर्षा होने से पहले ही

मेरे पलकों को भींगा दिया

यहाँ पर बदली छायी है

प्यार हर सवाल का ख़ुद जवाब है

अपने आप से पूछो

तुम्हारा जो दिल कहता है

वही तो मेरा भी दिल कहता है

तुम जितनी अच्छी हो

आदत व्यवहार मे

उतना ही मै भी हूँ

विश्वाश करना चाहिए

मै वचन देता हूँ

आपकी मै इच्छा के अनुसार ही रहूँगा

प्यार हर सवाल का जवाब है

प्यार हर सवाल का ख़ुद जवाब है

प्यार हर सवाल का ख़ुद जवाब है

मै जमीं पर उतर आऊ

कोई कैसे बताये की
वो कौन है
मै एक सरल पगडंडी
जिसकी यात्रा लम्बी है
जिसका साथ तुम्हे देना जरुरी है

अगर हर पल जीवित सा लगे
रोशनी सा बिखर जाए
खुशी से मन झूम जाए

जिसकी कविता अपनी लगे
जिसकी बाते अपनी सहेली सी लगे
जो किसी जन्म का संगी लगे
अब भी क्या यह पहेली है

{किशोर }

रविवार, 21 जून 2009

बिना शरीर का मन -2

धीरे धीरे नाव अब नदी के मंझधार की ओर बढ़ रही थी
सारा परिवेश श्याम और सिंदूरी रंग से भर गया था
हम दोनों सोच रहे थे
क्या ऐसा नही हो सकता की हम दोनों आज के इस संयोग को
दिन
माह
बरस ...फीर अन्नंत जन्मो के लिए संजो कर रख सके

यदी मै और वह मिलकर भी "प्यार की सबसे लम्बी रेखा खिचे " तो भी मृत्यु के हाथो
भविष्य मे किसी एक दिन अलग होना ही पडेगा -इस भौतिक शरीर का या साकार मिलन का
औचित्य क्या है ....यह केवल परिचय का माध्यम है बस
प्रेम की गंगा तो मन मे बहती है

उसने मेरी आँखों को चूम लिया
वह भी यही सोच रही थी ...ट्रेन मे मिले दो यात्रियों की तरह ...बिछड़ने के बाद भी
क्या उस परिचय को हम प्रेम मे बदल सकते है

बिना शरीर का मन

हम पहली बार मिल रहे थे ,

सूरज दिन भर थक कर अब विश्राम करने की तैयारी मे था ,

शाम होने का यह धुंधला होता हूवा या कहे दिन का ओझल होता हूवा -यह दृश्य

बहुत ही प्यार से भरा होता है

लोग जोडियों मे शहर से दूर इस नदी के तट पर नाव मे बैठ कर छोटी सी यात्रा के लिए

यहाँ रोज पहुच ही जाते है


जल मे लहरों ने तुम्हारी उभर आयी परछायी को मिटा दिया था

मुझे दुःख हूवा

नाव पर बैठी हुवी तुम मेरे करीब थी

संध्या की सुनहरी किरणों से उसका चेहरा दमक रहा था ,वह ऊपर से शांत लग रही थी

लेकीन उसका शरीर दहक रहा था

काले रंगके आँचल से ढके सिर से मुझे उसका गोरा मुखडा बस दिखायी दे रहा था

मुझे लगा की मै उसे चूम लू


मै सोचने लगा क्या एक दिन वह भी आयेगा जब ..हवा की नदी मे पत्तो सा तैर रहे हम दोनों को

एक तेज झोका इसी तरह मिटा देगा


मुझे फ़िर दुःख हुवा ,मै उसके और पास सरक गया ,क्योकी मै उसे किसी भी हालत मे खोना

नही चाहता था ..चाहे कई जन्म लग जाए


वासना ,देह तक सिमित होती है लेकीन प्यार मे आत्मा के साथ -साथ देह ,मन सब शामिल होते है

यह सच भी सबको पता होना चाहिए


खैर मै उसकी उपस्थिति को इस धरती पर महसूस कर लेना चाह रहा था

उसने भी मुझे छूकर देखा जैसे मै वाक्य हूँ या नही

मनुष्य का जीवन तिनके की तरह है ,पतवार की वार से कौन सा तिनका किस दिसा मे बह जाए

कौन किससे बिछड़ जाए .....कोई नही जानता


सब अनिश्चीत है

लेकीन ताज्जुब है हम सब कितने निशचिंत हैं

मै हमेशा रहूंगा का भावः ही तो जीने की मूल प्रेरणा है

शाम के इस क्रमश: गाडे होते जा रहे काले रंग मे हम दोनों भी दो स्लेटी धब्बो की तरह

आपस मे घुल jaanaa चाह रहे थे



अमृत जान कर

जीवन भर

फ़िर

मृत्यु के ठीक पहले तक

मै उसका इंतजार करता रहा

पर

वह नही आयी

मेरी आँखे उसका चेहरा बन गयी

मेरे ख्याल उसका जिस्म बन कर बर्फ की तरह जम गए

मेरे ओंठ उसके नाम के अक्षर बन गए

पर वह नही आयी

बहुत सालो बाद उसे पता चला

तब मैने उसके आंसुओ को अमृत जान कर पी लिया

मुझे उससे शिकायत न तब थी

न अब है

क्यो की

मुझे मालूम है

प्यार का मतलब -वियोग ही होता है

{किशोर }

अगले जनम मे मिलने से इनकार मत करना

मुझे सपना समझना

लेकीन

सदैव अपना समझना

मै जग रहित हूँ

लेकिन

तुम्हारे सहित हूँ

मै तुम्हारे मन की अन्तिम परत हूँ

जहा

पर

प्यार के प्रकाश की मोटी सतह है

मै तुम्हारी कल्पना का सुख हूँ

तुम्हारी चेतना का स्वरूप हूँ

मुझे अपने बाहुपाश मे ही रखना

अपनी अधर प्यास ही समझना

मै तुम्हारे चुम्बनों से रंगा रुख हूँ

मुझसे केवल प्यार करना

इस जन्म न सही

लेकीन

अगले जन्म मे मिलने से इनकार मत करना

{किशोर }

शनिवार, 20 जून 2009

बरसात सी बरसेगी मुझपर

जग की shankha से

अलग

एक shankha और है जो मुझसे बाते करती है ,जो मेरी कविता गौर से पड़ती है

मै उसका ही प्रतिरूप हूँ वो मुझे कभी हवा मे उड़ती हुवी आँचल सी मिलती है

कभी घाटियों से उतर कर नदी सी मेरा रास्ता रोकती है

हंसती है तो अंधेरे मे रोशनी के दानो सी बिखर जाती है

मुस्कुराती है तो सुबह की लालिमा उसके गालो को रंग जाती है

जब वह चुप रहती है तो ,दीपक की लौ सी स्थिर हो जाती है

मै उसके प्यार के आकाश के निचे बैठा हूवा बादलो की बनाती जाती

विभिन्न आकृतियों की तरह उसे देखता रह जाता हूँ

सोचता हूँ वह मुझसे बहुत दूर है

सितारों की जैसे नूर है

बरसात सी बरसेगी मुझपर

तभी मिल पाऊंगा उससे

संसार के नियम भी तो क्रूर है

{किशोर }

सच्ची बात {a true photo ...needs no oath }

ऐसे
यह कहते ही
आपस मे
की
मै तुमसे प्रेम करता हूँ
पानी मे आग लग जाती है
एक बीज अंकुरित हो जाता है

एक
कहानी
के जीवन मे
एक ट्रेन -स्टेसन से छुट जाती है

कुछ ऐसा ही
तुम्हारा
और मेरा
अमर रिश्ता है

हम दोनों
रेल की दो समानांतर पट -रिया है
और
तुम्हारे और मेरे नाम की एक रेल
सतत ।
हमारी धडकनों की तरह
धडधडाती हुवी
इन पटरियों के ऊपर से गुजर रही है

मै केवल तुम्हारे

घने
सच्चे
मेरे लिए अब बन गए
आंसुओ के महासमुद्र मे
एक हिम -शिला की तरह
लगभग पुरा ही
डूबा हुवा हूँ

तुम
अन्नंत भावो से संवरी हुवी अनेक तस्वीर हो
मै
अन्नंत विचारों से बनी हुवी अनेक कविता हूँ
तुम चित्र की भाषा हो
मै उस चित्र -मय भाषा की -कविता हूँ

वह बीज प्यार का अब पौधा बन चुका है
वह चिंगारी -दावा नल बन चुकी है

इस पौधे मे
फूल बहुत है
तुम्हारे जुड़े मे इन फूलो को मै सजाना चाहता हूँ

ट्रेन मे खिड़की के पास
बैठी हुवी तुम्हारी आँखे
घूमते हुवे -इन वन दृश्यों मे
मुझ एक वृक्ष को खोजती है

या मुझ एक शहर को तलाशती है
सारे दृश्य -पेड़ ,नदी ,समुद्र ,शहर ,भीड़ .....
सब गुजर जाते है
लेकी न तुम मुझे दीखती हो
न ही
मै तुम्हे दिखायी देता हूँ

लेकीन फ़िर भी
हम दोनों एक दुसरे के सबसे ज्यादा करीब है

तुम मेरी केन्द्र -बिन्दु हो
और मै वृत्त की परिधि
तुम अन्तिम लक्ष्य मेरा
मै तुम्हारी शुरुवात हूँ
मै सच्ची एक तस्वीर हो
मै एक सच्ची बात हूँ
{a true वर्ड or a true photo
.......needs no oath }

{किशोर }

गुरुवार, 18 जून 2009

शिखर पर जमी बर्फ है

शिखर पर जमीं बर्फ है १-शिखर पर जमीं बर्फ हैप्यार के पाँव फिसल न जाएहाथो मे हाथ रहेमजबूती से यही शर्त है शिखर पर जमीं बर्फ है२-सदा मुस्कुराते रहोस्वागत मे हमारे खिलेफूलो का यही अर्थ हैशिखर पे जमीं बर्फ है३-मै तो तुम्हारा हमराही जन्मोसे तुम्हारा पुजारी तुम संपूर्णतः मुझे भायीशेष तुम पर निर्भर हैशिखर पर जमीं बर्फ है४-देह के गमले मे अंकुरितप्रेम एक सुंदर भावः हैइस पौधे को सदा सुरक्षीत रखनाहम दोनों की चाह हैमगर सिचने के लिए इसमे पानीअर्शु -पूरित दर्द हैशिखर पर जमीं बर्फ है५-व्यक्ति की पूजा ही सत्य हैमिल जाए जिसे अपना प्रेमीयह उसका सौभाग्य हैजीवन का यही मर्म हैशिखर पर जमीं बर्फ है{किशोर }

बुधवार, 17 जून 2009

शिखर पर जमीं बर्फ है

१-शिखर पर जमीन बर्फ है
प्यार के पाँव फिसल न जाए
हाथो मे हाथ रहे
मजबूती से यही शर्त है
शिखर पर जमीन बर्फ है

२-सदा मुस्कुराते रहो
स्वागत मे हमारे खिले
फूलो का यही अर्थ है
शिखर पे जमीन बर्फ है

३-मै तो तुम्हारा पुजारी
जन्मोसे तुम्हारा हमराही
तुम संपूर्णतः मुझे भायी
शेष तुम पर निर्भर है
शिखर पर जमीन बर्फ है

४-देह के गमले मे अंकुरित
प्रेम एक सुंदर भावः है
इस पौधे को सदा सुरक्षीत रखना
हम दोनों की चाह है
मगर सिचने के लिए इसमे पानी
अर्शु -पूरित दर्द है
शिखर पर जमीन बर्फ है

५-व्यक्ति की पूजा ही सत्य है
मिल जाए जिसे अपना प्रेमी
यह उसका सौभाग्य है
जीवन का यही मर्म है
शिखर पर जमीन बर्फ है

{किशोर }

शिखर पर जमीं बर्फ है

१-

मंगलवार, 16 जून 2009

कईजम -जन्मान्तर का लगाव

तुम कविता हो

और मै ...कविता सा रह गया हूँ

मेरे लियें कोई शहर है

अब न कोई गाँव

मै रहता हूँ जहाँ

वह है बस -तुम्हारे प्यार की छाँव

तेरी याद मे जीता हूँ

तेरे जादुई स्पर्श को हर कदम पर

महसूस करते है मेरे पाँव

यकीन तो तुम्हे भीहै

तुम्हारी आँखों से साफ़ झलकता है

मेरे लिए तीव्र बुलाव

कभी-कभी लगता है उड़कर आ जाऊ

और बैठ जाऊ तेरे ख्यालो के मुंडेर पर

फ़िर महसूस करू तुम्हारी नर्म हथेलियों का सहलाव

तुम्हारे शहर का न तुम्हारे नाम का पहले पाता था मुझे

वरना इतने बरसो उम्र के न जीते मेरे सभी पड़ाव

क्या काहू कुछ समझ मे नही आता

यह तेरा सम्मोहन है या कई जन्म -जन्मान्तर का लगाव

{किशोर }

तुम्हारे हर ख्वाब का मै हूँ प्रिये दृश्यांकन

जिसे पुकारता है तुम्हारा मन

मै वही हूँ तुम्हारा अदृश्य सजन

ओढ़कर जिसे सोता है तुम्हारा स्वप्न

वही चादर नींद की मै हूँ गहन

जिसकी महक से घिरी रहती हो

तुम्हारे दिल के बाग़ मे खिला वो एक हूँ सुमन

तुम्हारा छूता हूवा बचपन

और शेष रह गया हूँ यौवन

जी लो मुझे मै तुममे ही हूँ

उपस्थित ओ मेरे सुंदर प्रीतम

प्यार के मीनार की उचाई हूँ

हूँ हमारे जन्मो के रिश्ते के किले का अमित रंग

संगमरमर के फर्श सा

इंतजार मे तेरे अब तक बिछा था

आओ चल लो मेरे संग अब हरदम

तुम्हारे हर ख्वाब का प्रिये मै हूँ दृश्यांकन

{किशोर }

मै शब्द

अपनी उड़ान की उचाई से

देखना नीचे

असंख्य शब्द

तुम्हे समुद्र

पर तैरते हुवे दिखाई देंगे

कही पर बिखरे हुवे से

घर

रास्तो मे अनुपस्थित

मनुष्य के अभाव -

खाली -खाली सा -हिरदय को छुएंगे

मै हूँ शब्दों की हरी -हरी पत्तियों से भरा

एक वृक्ष

तुम्हारेविचारो के अनुरूप

एक काव्य

प्रयत्न करना

मुझे तलाशना जरुर

वैसे भी अब नही रहा दिल्ली दूर

तुम अब कविता हो

जिस जगह

या

जिस व्यक्ति के पास

नही होंगे तुम्हारे शब्द

उसमे दिखाई देगा तुम्हे

आडम्बर और झूठ

इन शब्दों के बिना

समझ मे नही आयेगा तुम्हे

किसी अजनबी का स्वरूप

तुम्हारे मन के पन्ने पर अन्कित हूँ

मै शब्द

शब्दों का समूह

तुम्हारे विचारों के अनुरूप

{किशोर }

तुम नदी मै एक द्वीप

किरनोसे लिपटी
झिलमिलाती हुवी
प्यार से भींगी
चांदी के जल सी
तुम एक नदी
मै हूँ मौन
स्थिर एक द्वीप

मानो तुम हो जगमगाती मोती
और मै
एक सीप

तुम मेरे स्मरण की
एक लम्बी वक्र रेखा
मै जलता दीपक ठहरा
एक बिन्दुसा स्थिर

तुम कभी नम ले मेरा सिसकती
बिखर न जाऊ मै
सोच -सोच सहमती
चट्टानों के जग के करीब से
सुरक्षीत सरकती
हुवी गुजराती

तुम विरह की मूर्ती
मै तुम्हारा भग्यशाली मन मीत
तुम नदी मै एक द्वीप

{किशोर }

सोमवार, 15 जून 2009

मेरी प्रेरणा

१-मै

आधा -अधुरा अज्ञानी

तुम

शिखर तक मुझे पहुचाने का बीडा उठाने वाली

महादानी

२-तुम लगती मुझे

सरस्वती माँ की एक मुरत्त प्यारी

समीप बैठ बोलती ईमला

तब मै

लिख पाटा यह सब कविता सारी

तुम सतह

मै भरा केवल पानी

शिखर तक

मुझे पहुचने का बीडा उठानेवाली

तुम हो अमृतवाणी

तुम

शांत स्थिर पहाड़

मै

कल -कल बहता प्रवाह

तुम मंजिल

मै राह

तुम सम्पूर्ण उपन्यास

मै एक छोटी कहानी

शिखर तक

मुझे पहुचने का बिदा उठाने वाली

तुम हो

मेरी प्रेरणा

अदभुत -परम आत्मा सयानी

{किशोर }

संग तुम्हारे ही रहता हूँ

मै
तुम्हे
खोजता बैठा रहा
हर प्लेटफार्म मे
हर ट्रेन मे धुड़ता रहा तुम्हे

हरी -हरी पत्तियों से
भरी टहनियों पर
बैठे
पंछियों के कलरव
मे गूंजता रहा
तुम्हारा नाम,

सुदूर आकाश मे
सूर्यास्त होने के पूर्व
बादलो से झांकती रही
तुम्हारी
स्वर्णीम आभा

तुम हर जगह थी
मेरे भीतर
और
बाहर कर हर दृश्य मे
हर बोल मे
मै
अब तुम्हे ही
देखता हूँ
सुनता हूँ
संग तुम्हारे ही रहता हूँ

{किशोर }

मुझे अपने पास रख लो

अपनी हथेली की रेखाओं मे
मेरा नाम लिख लो
मुझे अपने पास रख लो

अपनी आँखों के पिंजरे मे
मुझे
कैद कर लो

अपने मन रूपी गमले मे
मुझे गुलाब सा उगा लो

अपने आँचल के छोर मे
एक स्वर्ण सिक्के सा बाँध लो

मुझे अपने पास रख लो

उड़ते हुवे अश्व पर बैठा
एक राजकुमार मुझे
अपने हर स्वप्न मे
मुझे मान लो

अपनी बांह मे बंधी ताबीज
के भीतर
एक मन्त्र सा मुझे भर लो

अपनी गोल बिंदिया सा
मुझे अपने माथे पर
लगा लो

अपने हाथो मे रत्न जडित चुडियो सा
मुझे पहन लो

मुझे
अपने पास रख लो

मै तुम्हारी
पूजा की थाली मे
रोज -दीपक सा जल जाउंगा

मै तुम्हारीजिंदगी मे
शाश्वत -आस्था बनकर रह जाउंगा

मै तुम्हारी साँसों मे
मोंगरे सा महक जाउंगा

मै तुम्हारे ओंठो पर
गुनगुनाता हुवा सा -एक गीत रह जाउंगा

मै प्यार के कोमल कपास से बना तकिया हूँ
तुम्हारी तन्हाई की बांहों के लिए
भींचने के कम मे आ जाउंगा
मुझे अपने पास रख लो

{किशोर }

शनिवार, 13 जून 2009

आओ मुझे अपनी बाहों मे भर लो

नदी के

के इस पार

शब्दों का मेला है

कोई तुम्हे -

पुकार रहा -माँ

दीदी

पत्नी

दोस्त

प्रेमिका

इस भीड़ के लिए तुम

देह के दर्पण

का

अलग -अलग

हिस्सा हो

किसी के लिए बिंदिया

किसी के लिए राखी हो

आँचल मे प्रसाद सा भरा प्यार

सभी को चाहिए

कुत्तुश को भी -

लेकीन किसी के लिए वैशाखी हो

फिरभी -अपनी सम्पूर्णता के

महा एकांत मे

उस निर्जन मे

नदी के उस पार

मै कह रहा हूँ

आओ मेरे पास

मै हूँ सम्बंधोसे परे

एक

शब्द -केवल प्यार

तुम्हारी चेतना

तुम्हारा जागरण

तुम्हारा स्वप्न

तुम्हारी जड़ ,

पूर्ण साकार चंदन सा महकता

वन मै ही हूँ

आओ

मुझे अपनी बाहों मे भर लो

{किशोर }

मै ही भरा हूँ

शुक्रवार, 12 जून 2009

तुम्हारे करीब हूँ

जैसे
जंगल का
जग -मुझेदेखता है
स्वप्न की नींद
मेरी उड़ान को नापती है
लोगो का शहर मुझे तलाशता है
उसी तरह तुम्हारे
भीतर की
सम्पूर्णता -मुझे खोजती है
और मै
बेर के फल मे झाडी की तरह
किसी पत्थर से
घायल आम मे -वृक्ष के तरह
या
किसी प्यार मे -
दिल की तरह -धड़क रहा हूँ

मेरे कहने का अर्थ यही है
मै
धड़कन हूँ
तुम्हारे करीब हूँ
तुममे हूँ
और तुम मुझमे
_{किशोर }

तुम्हारा सच हूँ

तुम्हारे मन के कोरे कागज मे
मै
एक छापा मनचाहा चित्र हूँ
सबसे प्रिय कविता हूँ
सर्वोच्च कल्पना हूँ
तुम्हारा अन्तिम ख्वाहिश हूँ

मेरी पीठ
तुम्हारी उतरती हुवी उम्र के लिए
स्वर्ण सीडिया है
मै तुम हूँ
तम्हारा सच हूँ
{किशोर }

बुधवार, 10 जून 2009

शब्द और रंग

तुम

अपने चित्र के लिए

जहाँ से लाती हो रंग

मै भी

वही से लता हूँ

कविता के मुक्त छंद


निशा के गहन तिमिर मे

घेरती है तुम्हे आकर

जब

ज्योतिर्मय काल्पनिक आकृतिया

तब

तुम चाहती हो

जग की सारी रोशनी को उडेल

बना लू

एक चित्र सुंदर अखंड


उसी समय मुझे

बिठा अपने समीप

कविता कहती लिखो

एक गीत प्यार भरा

वरना रूठ जाउंगी

भूल गए क्या तुम

मुझसे अपना अनुबंध


साथ साथ रचता

यह विश्व प्रतिपल

दोनोंके मन को

कर सम्मोहित

एक शब्द मै बनता

उसी क्षण बनती तुम

सब रंगों से मिश्रित एक बूंद

फ़िर

फैलकर कागज पर

संवर आती

सचित्र

अमित रूप लिए नवरंग


{किशोर कुमार }

मंगलवार, 9 जून 2009

कवि और कविता

१-कवि तन्हा नही आया था
सात अक्टूबर की शाम
जलना था रावणको आज
ठीक इसी दिन चार साल बाद
कविता जन्मी थी प्रात
लक्ष्मी आयी हो ले धन अपार

२-अनेक जेठ अषाढ़
बीत गए फ़िर
बसंत माघ

३-घोसलों के अन्नत तिनके
बिखरे हजारो बार
फ़िर जुड़ गए लिए nayii उड़ान

४-महानदी हो या हुगली
दोनों सागर तक फैली
धान उगा खेतो मे
बहा ले गए सब खार

५-गाँव कवि का वही रहा
बबूल काँटों को सता रहा

६-शहर कविता को पढाता गया
कविता मे निखर आता गया

७-जलते दियो सा -
जग के अंधियारे मे
धुदते रहे एक -दुसरे का चेहरा
हर धूमिल आईने मे


८-कभी लगता
नदी की गहराई सा
उन्हें कोई पुकार रहा

९-या
सुने मे कोई नूर
उन्हें बुला रहा

१०-कभी लगता कोई पन्ना
प्यार अमर सिखला रहा

११-चलते -चलते पावो को सुर खीचते
दूर कही बांसुरी मक्नो कोई बजा रहा

१२-फ़िर एक दिवस ऐसा भी आया
काल मयूर ने मोहक नृत्य दिखलाया
आषाढ़ के बदल छंटे
सरसों सा खिलकर पुलकित उनके दिल हँसे

१३-अब दोनों सदैव -बसंत है
मधुर तट पर
प्रेम लहरों मे दुबे
एक जोडी आलिंगनबद्ध शंख है

{किशोर }

कृष्ण -अर्जुन

बहुत सुंदर चित्र बनाया है आपने

कृष्ण और अर्जुन दोनों को सही मानव आकृति दी है

रंगों का चयन भी अच्छा है

कृष्ण और अर्जुन सखा ही थे

गीता मे आख़िर मे श्री कृष्ण ने ,अर्जुन को समर्पण का
अति सरल मार्ग बता ही दिया
हमारी गीता मे मै अर्जुन हूँ और आप श्री कृष्ण
इसलिए मै अज्ञानतावश ज्यादा बोल जाता हूँ
आशा है आप हमेशा मेरा सोखा और सारथि
के रूप मे सप्रेम मेरा मार्ग -दर्शन करती रहेंगी
{किशोर }

बोलू मत

यदी
तुमने ,मेरे प्रभु ने ही
कह दिया कि
मै अभी
बोलू मत
प्राथना न करू
तो
मेरे सामने
एक ही रास्ता बचा है
कि मै
इन्तजार की बहुत लम्बी
राह पर चल पडू
कही बैठ कर ,ठहर रहने से
तो
यही अच्छा है की
मै बस बहता रहू
मेरी आस्था सचमुच मे यदि
गंगा है
तो
मुझे किसी भी पल प्रभु
कहेंगे कि
तू निष्कलंक है मै तो
जानता था
तू परीक्षा मे उत्तीर्ण हूवा
{किशोर }

और तुम्हारे

मै
एक कवि हूँ
जो देखता हूँ
लिख देता हूँ
लेकिन
उसे कोई पढ़ता है या नही
मुझे नही मालूम
जैसे
शरीर मरता है सब जानते है
परन्तु
मन -पल भर मे
कितने बार
मरता है या जीता है
इसे कोई नही जानता
सिवा -मेरे
ईश्वर के
और
तुम्हारे

मेरे फूल से शब्द
या
मेरे कांटो से अक्षर
कभी -कभी
मेरी आँखों मे -मोटी से चमकते है
या आंसू से उतरते है
केवल
मै
या ईश्वर
या तुम बस -जानती हो
क्योकि -मै तुमसे प्यार करता हूँ
और तू मुझसे ....

{किशोर कुमार }

सोमवार, 8 जून 2009

श्वेत -चादर

शब्दों के धागों से बनी एक
पवित्र
श्वेत चादर
मैने
ईश्वर को -सप्रेम समर्पित किया है
मुझे उम्मीद है
पुरा विशवास है
उस चादर मे एक भी अक्षर
मैने काली स्याही से नहीलिखा है
और इसे हे ईश्वर !
तुम स्वयं
इसके साक्षी हो
फ़िर भी मेरी
परीक्षा मे
यदी तुम
मुझे -कष्ट देना चाहते हो
तो वह
मुझे सहर्ष -मंजूर है
लेकीन सजा -
लगातार देते रहना
मुझे -भगवन
प्रसन्नता होगी
{किशोर }

जो सोचते हो बोलते नही जो बोलते हो उसे सोचते नही

कया मै
पेड़ हूँ -जो सोचता है पर बोलता नही
क्या मै वो आदमी तो नही जो
दिन भर बोलता है ,बस बोलता है
पर
सोचता नही
पर इस सोचने और बोलने के बीच
प्यार दब कर -कराहने लगेगा
मैने सोचा नही था
बोलने और सोचने का अर्थ जान गया हूँ
मै तुम्हें चाहता हूँ
यही तो कहना है
फ़िर सोचना कुछ भी नही है
जैसा वोपुछे या
बताये -फ़िर बोलना है
फ़िर सोचना है
{किशोर }

हर जन्म मे

>good afternoon

प्रियशंखा जी ,
आप अपनी एक कविता भेजे
मुझे अपने ब्लाग के लिए चाहिए
मुझे नेट ने स्क्रेप पोस्टिंग से रोक रखा है
इसलिए टेस्टी - से अनुरोध कर रहा हूँ
आशा है आप मुझे अवश्य एक कविता भेजेंगी /
कविता -
किसी न पढ़ी गयी किताब की तरह
उसे खोजता हूँ पुस्तकालय या बाज़ार में
या
फिर पीपल की छान्व से पूछता हूँ
वो-
यहा आयी थी क्या कभी ...?
कभी लगता है अभी -अभी -इसी ट्रेन में बैठ कर चली
गयी ॥
वह हर बार ,हर समय ,हर जन्म में
मुझे लगाता है -कुछ छूट रहा है मुझसे जैसे ....
मेरे पहुँचने से ठीक पहले -कोई ले गया हो वह पेंटिंग जिसे -
मै खरीदना चाहता हूँ
खाली गिलास की तरह मैं प्यासा ही रह जाता हूँ
वह पानी की तरह बहती हुवी मेरी पहुँच से -
बहुत दूर निकल जाती है
क्या मैं सिर्फ़ इंतज़ार करता हुवा तट हूँ ...
और ....
वह एक लौट कर -न आने वाली
लहर यदि तुम ....मेरी आत्मा हो ॥तो ..
सच बतोओ ... कितनी बाहर हो और कितनी मेरे
भीतर मैं तुम्हें इन उन्गलियो से छूना चाहता हूँ .....
या
तुम ही पहचान लो मुझे .....
मेरा कौन सा नाम ,रंग ,चेहरा पसंद है तुम्हें ?
रूप बदलते ....बदलते .....थक चुका हूँ मैं ।

{किशोर कुमार खोरेंद्र }

गुरुवार, 4 जून 2009

जेनी शबनम कीकविताओ के नाम

चाँद-सितारे दफ़ना दो यारों राजनीति... ज़िन्दगी तमाम हो जायेगी...


कविता ख़ामोश हो गई है... मुहब्बत ... पहला लफ्ज़ ... घर ...

अभिवादन की औपचारिकता...
आँखों में नमी तैरी है ... अच्छा हुआ तुम न आये... अनुत्तरित प्रश्न है...

ख़ुद पर कैसे लिखूं... मेरा अपना कुछ...
मेरी आजमाईश करते हो... सुलगती ज़िन्दगी


अनुबंध...



न तुम भूले...न भूली मैं...


क्या बात करें...



मैं और मछली...


रिश्तों का लिबास सहेजना होगा...

रिश्ते...


जिंदगी एक बेशब्द किताब...


वक़्त मिले न मिले...


बीती यादें...




चुनाव...नेता...

कामना...


हंसी, ख़ुशी और ज़िन्दगी बेकार पड़ी है...


अपंगता...
दुआ...



यकीन...



बुत और काया...



अवैध सम्बन्ध...



हम अब भी जीते हैं...


एक गीत तुम गाओ न...



कल रात...

कुछ पता नहीं...


खुशनसीबी की हंसी...




अपनी हर बात कही...




चुप...



लिखूंगी रोज़ मैं एक ख़त...
नफ़रत के बीज...काश ! ऐसा होता...


मैं आज ग़ज़लों की किताब बनूँगी...


ख़ुदा की नाइन्साफी...


अधूरी कविता...



थक गई मैं ...


रात का नाता...मुझसे...