मंगलवार, 5 मई 2009

१४१-कविता -सुकरात और मीरा ने जहर को नही पीया

१-जिदगी ख़ुद
समझ मे नही आने वाली
एक
अंतहीन
लम्बी कविता है
२-इसलिए
मुझे
कटघरे मे खडा कर
क्यो पूछ रहे हो
मेरी कविता का अर्थ क्या है
३-मेरी कविता मे

नदी की तरह तुम भी हो सकती हो
या
तुम्हारी तरह एक नदी भी हो सकती है
४-मै छंद -रहीत
स्वतन्त्र काव्य हू
केवल भावः हू
विचारों का प्रवाह हू
५-सुकरात और मीरा ने जहर को नही पीया
जहरीले प्यालो ने -उन्हें पी लिया था
६-कहा से आया ,कहां जाना है
न जाती ,न धरम ,-न मेरा कोई ठिकाना है
एक
लापता
पगदंडी सा मै
स्वयम तलाश रहा हू
सदीयों से ....
अपना वजूद
अब बताओ -
कहां है तुम्हारे पास
मेरे गुनाहगार ...
होने का सबूत
७-अमृत -मयी कवीता से
जहर को अमृत बनाना है
बरसो से
हमें
सत्य को ....
घेरते आए कटघरे को
अब
घिर जाने दो ....
सवाल ...?
मै तुम
हम करेंगे .....
उत्तर ...?
अब
इस घमंडी
बेखौफ
निशचिंत
कटघरे को देने दो .
{किशोर कुमार खोरेन्द्र }

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