शुक्रवार, 22 मई 2009

अब रखा है आंच पर

१-अब रखा है

आंच पर -

प्यार

उसे चुप-चाप पकने दो

या -अंकुरित हुवे

मुझ गुलाब के -

नन्हे ,---इस सच्चे पौधे को

तना ,...शाखाओं ,...पत्तियों ,....का आकार

धर लेने दो

ह्रदय के गमले मे ही सही

एक दिन ....जब ...प्रेम ....सुमन बन कर

तुम्हारी पूजा की थाली मे ......सज जाए

तब तुम भी .....उसकी ..सुगंधा ..बन जाना

एक हंस ......हंसा से .....यही चाहेगा

तन्हाई की बिछी रेत .....पर ...पडा ....एक श्वेत शंख

अपने समर्पण के प्रति- दान मे

एक -भव्या ,चिर स्मिता ,अपराजिता ,ममता की मूर्ती ,

स्नेह और सौन्दर्य की देवी शंखा से

और क्या चाहेगा ......

{किशोर }