सोमवार, 18 मई 2009

१७२-कविता -तुम कौन

तुम कौन

१-तुम कौन
एक् अपरचिता
या
चिर परिचिता
२-जीवन की इस भाग -दौड़ मे
उहा -पोह से
भरी दिन -चरयाओ मे
आतीहो
प्रतिदिन
हर प्रात की बन शुभ -चिंता
३-रात सपनो के
जंजीरों से
या
फ़ीर -विशाल तम -आकारों के भय से
मुक्त होते ही
मेरे नयनो के द्वार खडी
तुम लीये मुस्कानों की आरातीका दिया
मुझे लुभाती हो
मेरे मन आँगन मे
हर दिन
-एक् रंगोली से बनी
सौन्दर्य की देवी की बन प्रतिमा
४-तुम्हें अगर प्रिय मित्र कहु
तो यह लघु विशेषण होगा
तुम्हें अगर अपनी सहृदया कहु तो
तो यह मृदु -चिंतन होगा
तुम्हें यदी
मै
अपनी
सखी कहु तो यह अति -उत्तम होगा
५-हे मेरी प्रिय सखी
शायद
हम दोनों है
जन्मो से बंधे -बधी
६-अब तो कर लो
अपने नयन -करो से
मेरे खिले प्रेम- सुमन को
समझ
एक् सखा का
पवित्र समर्पण सही
{किशोर }

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