शुक्रवार, 15 मई 2009

१५९-कविता -प्रेम का गुपचुप अहसास

१-देखो तो

तुम्हारे रुमाल मे

मै कही
तह करके
रखा हुवा तो नही हू
तुमने इत्र भी नही छिड़का है
फ़िर भी रुमाल
मेरे पसीने की तरह महक रहा है

२-तुम्हारे पर्स मे
मेरी फोटो की जगह
सिर्फ़ नोट है
फ़िर भी मुझे
खोये हुवे एक सिक्के की तरह
क्यो खोज रही हो

३-तुम्हारी चप्पले बार -बार
भीड़ से अलग
सुने एकांत मे क्यो
जाना चाह रही है
कही वहा
एक -वृक्ष के नीचे
छाँव की जगह मेरा साया तो नही है

४-तुम्हे दर्पण मे
मै
क्यो दिखाई दे रहा हू
कही तुम्हारी सूरत ने
रत -भर मे
अपना मुखौटा
उतार तो न्हीदिया है

५-एक रंगीन पंख ने
समीप आकर
तुम्हारे कानो को सहला दिया है
तुम्हे -प्यार से उसने पता नही क्या कहा है
की तुम्हारे गाल -गुलाबी हो गए है

६-तुम मंद -मंद मुस्कुरा रही हो

एक पुरानी धुन मन ही मन -गुनगुना रही हो
तुम्हारा हर्ष देख कर
फूल भी मुस्कुराना भूल सा गया है

{किशोर कुमार खोरेन्द्र }

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