गुरुवार, 14 मई 2009

महक रही हो

वर्षा की हलकी बूंदों से
भीगी हुवी मिट्टी मे
तुम
सोधी सोधी
खुशबु सी -महक रही हो

तुम्हे स्पर्श कर
मुझ तक पहुची
शशी किरणे
और चमक रही है
तुम्हारे अधरों को
चूम कर लौटी
लहर को
नदी ने -सुरक्षित
मुझे लौटा दिया है
देह रूपी साडी
के
नित बदलते रंगों
से मेरा मन
रंग गया है
यह सच है
मत कर शंका
ओ ,मेरी शंखा

{किशोर कुमार खोरेन्द्र }

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