सोमवार, 18 मई 2009

१६७-कविता -मैने देखा एक सपना

१- मैने देखा
जागते हुवे
एक् सपना
२-तुम्हारा तड़फते हुवे -
रात भर जगना
कभी घुटनों को मोड़कर
कभी करवटे बदल कर
रात भर
जागने के लीये
सोने की कोशिश के
बहाने करना ...

३-कभी उठ कर
आईने के सामने
स्वयम कोनिहरना
क्या मै व्ही हूँ
कितनी बदल गयी हूँ

४-मन से
आँखों मे
कोई
क्यों
इस कदर चढ़ गया है
सोच -सोच कर हैरान हूँ
यह मुझे क्या हूँ गया है

५- मैने देखा
जागते हुवे
तुहारा
यह एक् सपना
{किशोर }

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