सोमवार, 18 मई 2009

१७०-तुम्हें खुश देखकर

तुम्हें खुश देखकर
मै भी
खुश हो गया

एक् ज्योति से
मै बाती मिलकर
मै भी
ज्योत
सा जल गया

अब हम
अखिल ब्रम्हांड
की
आरती मे
संग -संग
एक् दीपक सा जलेंगे
और पूजा की थाली होगी
यह धरा

तुम सहचरी मेरी
बातीसा जलना
मै
रहूंगा
आधार तेरा
बन
संगी
एक् माटी का दिया
अविरल स्नेह भरा

इसे एक् प्रेम पाती भर न
समझाना
यह है बाती के.....
गर्म ओठो से
माटी के सरस अधरोका
चिर आलिंगन -प्रिये ....खरा
{किशोर कुमार खोरेन्द्र }

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