रविवार, 24 मई 2009

कविता -स्वप्नों का सार

"स्वप्नों का सार " -1-क्या तुम आती-जाती लहर हो जिसके दिव्य स्पर्श का होता रहता आभास मुझे दिन रात २-क्या तुम ही हो वह सागर का विस्तार जिसमे मैने पा लिया है तुम्हारा प्यार अपार ३-क्या तुम व्ही मुस्कराहट हो जो डालफिन मछली सी करती रहती है निरंतर मेरा पीछा -सुबह -शाम ४-क्या तुम्हारा नाम ही मेरे हाथो को थामा हुवा वह -है पतवार जिसने मुझे ला खडा किया तुम्हें जान एक् खुबसूरत मंझधार ५-अब मुझे आगे की मेरी सम्पूर्ण यात्रा तुम्हारे आकर्षण की चुम्बकीय -सुई की नोक के मार्ग -दर्शन पर करना है साभार ६-तुम हो प्रकृती मै हूँ तुम्हारे सौन्दर्य की धुप के स्वर्णीम रूप -जाल मे -लापता एक् नाविक के स्वप्नों का सार {किशोर कुमार खोरेन्द्र}

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