मंगलवार, 12 मई 2009

१५३-कविता -लहरों ने

१-लहरों ने

तुम्हारे आँचल की तरह मुझे

छुवा

२- अब मै सोच रहा हू
कि

देह रूपी इस नाव को
इस -प्रेम -तरंगो के हवाले कर दू

३-मंझधार तक
पहुच जाऊ -जहा पर तुम

मेरा इंतजार कर रही हो
निर्वसना सी

४-तुमने अपनी आत्मा
से
देह का कपड़ा भी उतार दिया है

५-मुझे भी
अपने चमत्कार से
या -प्रभाव से
आवरण -विहीन कर देना
तब शायद
दो भंवर
आपस मे एकाकार हो जाए

हम दो आत्माए
एक साथ तल्लीन होकर
लीन होजाये

{किशोर कुमार खोरेन्द्र }

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