शनिवार, 23 मई 2009

१८४-

बिंदीया "
मैने नही
कहा
फ़ीर भी वहव्ही रंग की साडी पहन लेती है
जीसे मै पसंद करता हूँ
और छम से आ धमकती है
कभी मेरे समक्ष
मै तब किताब के शब्दों मे -एक् पन्ने सा रहता हूँ अटका हुवा
वो छीन लेती है मुझसे किताब
और अपनी आँखों को और बडी कर कहती है
अब पढो न -साबुत ताजी कविता
मै उसके रूप की गरमी से हुवा पसीना -पसीना
सोचता हूँ कितना मुश्किल है इसके बिना मेरा जीना
अब सचमुच मे वक्त मुझे धकेल कर उसकी गोद मे
आगे बढ़ जाएगा

वह कुवे से पानी ऐसे निकलती है
जैसे बाल्टी मे मै पानी की जगह भरा हुवा हौऊ
एक् बूंद भी प्यार छलक न पाए
मुझे देखते ही उसकी सुस्त चाल तेज हो जाती है
आप से आप गिरे आँचल को वह -सभालने लगती है

नारी माँ है
बहन भी है

लेकीन प्रकृति का -एक् ऐसा रंग भी है
जिसके बिना पुरुष की नजर मे -
यह व्यापक सौन्दर्य कितना अधूरा है
मानो----
सौन्दर्य एक् चेहरा हो
और नारी ...उसके मस्तक पर लगी
एक् शोभायमान ....बिंदिया हो

{किशोर कुमार खोरेन्द्र }

कोई टिप्पणी नहीं: