शुक्रवार, 22 मई 2009

भ्रम था

बहुत दिनों तक
जब
मै नही लिख रहा था
कविता
समुद्र से कुछ दूर
तटीय रेत पर
एक मछालिकी तरह जी रहा था
तड़फ रहा था
मेरे सपनो को लोग
अपने जूतों से कुचल रहे थे
दिन .....
सबह सुबह
मुझे हांकता हूवा
ले जाया कराता था
और
शाम -होते होते
एक खाई
या स्याही से खाली
हो चुके -रिफिल की तरह
छोड़ जाया करता था
माह
फ़िर इसी तरह -बरस बीत गए
गुलाम बन चुके इस जिस्म
से निजात पाना चाह रहा था
मै पिजरे मे कैद
एक चिडिया की तरह
रेत पर तड़फती
एक मछली की तरह
उड़ना
और तैरना
चाह रहा था
लेकीन
मुझेअपने -आकाश
और समुद्र की ख़बर ही नही थी
सचमुच मै ही
पंख और आकाश
मछली और समुद्र ..था
जब चाहे उड़ सकता

तेर सकता था
पिंजरे की उपस्तिथी
रेत का होना
भ्रमो की इस दुनिया मे
मात्र
एक भ्रम था
{किशोर }