मंगलवार, 12 मई 2009

१५२-कविता -जल और प्यास

१-मै तुम्हारा मन हू

अनेक शब्दों के बादलो से बनाता चित्र हू

या

अनेक चित्रों के अक्षरों से ,बनाता एक शब्द हू

२-तुम कभी बादलो को बाहों मे भर लेती हो

या

तुम कभी मुझ एक शब्द को पुकार लेती हो

३-तुम्हारी पुकार के प्रतिउत्तर मे
इस जग के जंगल से
कोई एक वृक्ष तुम्हे

अपनी टहनियों से -पत्तियों की तरह तोड़कर

एक चेहरा नही दे पाता

४-तुम्हारे चित्रमय सपनो से
लाख मांगने पर भी
एक भी स्वप्न अपने दायरे से बाहर
निकाल कर

तुम्हारे जागरण के लिए

तुम्हे

एक टुकडा मिश्री जैसा स्वप्न नही लौटता

५-और इस तरह

तुम्हारे पास

या
तो -बिना आकृतियों वाला शब्द रह जाता है

या

फ़िर -बिना शब्दों की एक आकृति रह जाती है

लेकिन क्या ...?

तुम मेरे लिए
और
मै तुम्हारे लिए

साकार शब्द है

यदि है ...
तो हममे से कोई एक जल है
और हममे से कोई एक प्यास है

इसके बाद शायद कोई तलाश शेष न हो ।

{किशोर कुमार खोरेन्द्र }

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