सोमवार, 18 मई 2009

१६८-कविता -अब तुम एक बाँसुरी हो

१-अब तुम एक बांसुरी हो
मधुर सुर से
भीतर ही भीतर
गूंजती हो

२-यह गूंज -
परम चेतना की समस्त सजीव
धडकनों
का
समवेत स्वर है
एक महातान है

३-तुम्हे सब सुनायी देता है
दिखायी देता है
असंख्य लोग
वनों ,पर्वतों ,
नदीयो ,सागरों
पर
पड़ता हूवा दिव्य आलोक

४-अब तुम इस जग रूपी -आईने से बाहर हो
छूकर
देखो
मै तुम्हारे करीब -तुममे
तुम्ही मे
या तुम ही तो हूँ

{किशोर }

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