सोमवार, 11 मई 2009

१४७-मायावी संसार

१-वो वृक्ष मेरा
क्या दोस्त है
जो बिठाकर मुझे अपने पास
मुझे देता -पंखुरिया ,
हरी पत्तिया
झुकाकर अपनी टहनिया
सहलाता मेरे सिर और बाल
उसके छाँव मे बैठा
कभी टिकाकर
तकिये सा उसका तना
सोचता हू यह वृक्ष भी किसी व्यक्ति सा
हो पायेगा मेरा अपना

२-सड़के
गलिया
सागर के तट
दफ्तर
खाली सीट -बसों के
या
मेरे इस शहर की लम्बी रेल -गाडीया
सब बुलाते
लेकिन शाम को घर लौट कर
यही लगता है
मिलना -जुलना था बस्
जैसे
दिन भर की नीद मे
घूमता रहा होऊ -बन एक् सपना

३-अख़बार मुझे पढने लग जाते है
घर मेरे भीतर रहने लग जाते है
जैसे जग मे मुझे रहना था
केवल अपने आप से ही शायद मिलना था
पर
जग की माया अपरम्पार
मुझमे आ रहता पूरा संसार
दुड़ता खुद को -
बिना जाने अपनी पहचान


{किशोर कुमार खोरेन्द्र }

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