बुधवार, 6 मई 2009

१४२-ठीक मृत्यु के पूर्व

ठीक मृत्यु के पूर्व

मुझे प्यास लगी थी
मै
गंगा -जल नही
तुम्हें
पीना चाह रहा था

नीद आ रही थी
मै
तुम्हारी गोद में
सर रखकर
गहरी नींद
सोना चाह रहा था

जैसे -कुंवे में बाल्टी सहित
रस्सी
छुट न जाए
ईस डर से
मै
उसकी हथेली को
कस के पकडे हुवे था

मेरी आँखों के सामने
एक् मंदीर की धुधली छवी के भीतर
माँ की मूर्ती की जगह
तुम
खडी हुवी
नजर आ रही थी

अपनी इस जीवन यात्रा में
मैने तुम्हारे सिवा
कुछ
देखा ही नही था

आकाश और धरती
के बीच
स्थित हर पृष्ट पर
तुम्हारा ही
चित्र देख रहा था

देह के भीतर से
अब
बाहर आ रही
अंतिम साँस में
मैने जाना
कि-
जीसे मै तलाशता रहा था
जिन्दगी -भर
वह -
ईश्वर तो तुम ही थी
{किशोर कुमार खोरेन्द्र }

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