सोमवार, 11 मई 2009

१४८-तुम सतरूपा

१-लहरों मे से एक लहर ने मुझे
तुम्हारे आचल की तरह
छू लिया
तुम्हारे स्पर्श की आंच से पिघलकर
मै एक चट्टान
शायद जिसे
तुम्हारा ही था इन्तजार
अब
बालू के कणों की तरह
तुम्हारी अन्जुरीमे शेष रह गया है
३-मैने तुम्हे यथार्त के तट से
हाथ पकड़कर
अपने स्वप्न के
रंगीन चलचित्र मे
खीच लिया है
४-मै असत रूप अणु -देह हू
और
तुम सतरूपा
मेरी आत्मा हो

{किशोर कुमार खोरेन्द्र }

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