सोमवार, 18 मई 2009

१७१-पूजा और बडाई

पूजा और बडाई

१-उस पार प्रिये
तेरा
इस पार प्रिये
मेरा
घर है
दोनोंके बीच
बहती नदिया
की नापी न जाये
इतनी है
गहराई

२-इस जल मे
सब
रहते है
माता -पिता
बहन
पति- पत्नी और भाई
बिना रिश्तो के
जीने मे
किसी को भी
प्रसन्नता कभी न आई

४-सात्विक प्रेम भी
अनबूझा रह जाता है
रिश्ते दारो का
मोह कभी भी
जाग जाता है
छोड़ उन्हें जो
जीना चाहते है
वो सब पीछे -पछताई

५-मिलना भी एक् पहेली है
जान ले तू तो
मेरी
प्रिय सहेली है
बात समझमे आयी

६-सोच समझ कर मिलना
सयम रख कर जीना
खुश होना पर
वियोग मे मत करना
तुम ज्यादा -रुलाई

६-ये जीवन है -एक् तपस्या
जो नर -नारी -सयम से मिलते है
जग वाले उनकी
करते है
पूजा और बडाई

{किशोर }

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