रविवार, 3 मई 2009

१३८-अपना मित्र नेक

हम सब है एक्
पर
सबमे
मै स्वयम ही
बन पाया हू
अपने लीये
अपना मित्र नेक
हंसता हू मिलता हू सबसे
क्यों सदा रहकर निर्लेप ...?
फ़ीर लौट आता हू
अपनी ही काया मे
गुफा मे
देख कर
सुख-दुःख के रंग अनेक {किशोर कुमार खोरेन्द्र }

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