बुधवार, 13 मई 2009

अनगिनत ,अन्नत सितारे और सागौन वृक्षो के पास

-अनगिनत ,अनन्त सितारे
रेत पर
पद-चिन्ह
छोड़ जाओ
कुछ दूर चल लूंगा
लहरों को
अपना नाम -पता
बता जाओ
ईसी धरती मे रहता हू
तुम्हें
धुड लूँगा
छांव मे
बैठी रह गयी है
तुम्हारी परछाई
बैठ कर धुप सा
तुम्हें
निहार लूंगा
अनगिनत ,अनन्त सितारे
जड़े है
तेरे आचल मे
जल बनकर उसे
नदी सा बिछा लूँगा
तुम्हारे प्रतिबिम्ब
को तुम मानकर
तुम्हें
न देख पाने का दर्द भुला लूँगा
मालूम है
फूल बनकर
तुम्ही खिली हो
मंजिल हो मगर
राह मे मेरे
पग -डंडियों सा
तुम्ही आ मिली हो
तुम्हारी बांहों के
अ -दृश्य घेरे से
घिरा हुवा होकर भी
तलाशता हू
मै
अपने स-दृश्य
एक् चेहरा
तुम्हारा
{किशोर कुमार खोरेन्द्र }


सागौन वृक्षो के पास
१-मै नही
सड़को पर घूम आती है
मेरी चप्पले
झोला ले आता है
बाजार से खरीद कर
सब्जी
लोगो को देखता
नहीं
मेरा काला चश्मा
कपडे की जगह
कभी -कभी
मै टंगा होता हू
धुप मे सूखता हूवा
लोग मुझे नही -
पहचानते है मेरी कमीज को
मै
एक
पुरे आदमी की तरह
कभी भी
लोगो के सामने नही आ पाता
इसलिए
हर मित्र की जेब से
मै
बरामद किया जा सकता हू
हर बार -अलग -अलग रूप मे



२-दोनों हाथ पडे रहते है
दफ्तर मे फाईलो के पास
किसी की आँखों के आईने ने
मेरा चेहरा चुरा लिया है
गाँव से आए पिता
के पांवो को छूने से
कैसे मना कर देगा मेरा कोट ॥?
पडोसी को शायद मालूम नही
की
गुडहल के फूल की
पंखुरीयो
सा .....
मै ही गिर जाया करता हू
अक्सर
अपने आँगन से
उसके आँगन -द्वार
मै ठहरा हूवा शरीर हू
इसका अहसास कभी नही होता मुझे
लगता है मेरा कद मेरी देह से बडा है
किसी डिब्बे मे बैठा हवा
मेरा शरीर भागता चला जाता है ...
रेलगाडी के साथ
और .....
.मै .........
छूट जाया करता हू
प्राय:
किसी न किसी
जंगल मे उगे हुवे
हजारो -सागौन वृक्षो के पास
{किशोर कुमार खोरेन्द्र }

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