शनिवार, 23 मई 2009

१८२-तुम मुझे कितना चाहती हो

१-एक नदी
की
कल्पना मे -
सिक्को की जगह -अपने छोर मे
जीने लायक यादगार पलो को
बाँध कर रखे -मेरे रुमाल को
तुमने -थामा नही
पानी मे बह जाने दिया
२-एक पहाड़ के स्वप्न मे
चोटी पर पहुच चुके -मुझे
वापस लौटने के लिए
एक पगदंडी को मेरे साथ
जाने से माना कर दिया
३-एक जंगल के चिंतन मे
तुमने मुझे
पेडो की छः से वंचित रखा
४-सपनो मे भी
kalpanaa -ओ मे भी
मनन मे भी
तुम कभी -नदी को प्यार की
छिटो की तरह -मुझ पर उडेलती रही
मै तुमसे दूर न चला जाऊ
इसलिए -पहाडो को भी
merii राह मे -
रोडे की तरह अटकाती रही
जंगल के मौन से
कभी -कभी मुझे डराती रही
५-सताते उसी को है
जिससे प्यार अधिक होता है
तो मै जान लू की
तुम मुझे कितना चाहती हो
{किशोर कुमार खोरेन्द्र }

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