शनिवार, 16 मई 2009

कविता -

१-मै अगरबत्ती के
धुवे सा -उड़ता ही रहता हू

तुम्हारे खयालो से

महकता ही रहता हू

२-मुझे मालूम है
तुम

सदेह नही आ पाओगी
फ़िर तुम्हारे -स्पर्शो को
तन्हाई की किताब मे
छपे शब्दों सा पढ़ता रहता हू

३-मै एक गीत हू
तुम्हारे ह्रदय मे -सस्वर वो गीत संचित है
मेरा भी मन -मौन होकर सुन रहा
तुम्हारे मौन को -यही क्या प्रीत है


{किशोर कुमार खोरेन्द्र }

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