सोमवार, 11 मई 2009

१४५-

छपी एक कविया सा
मै
अखबारों मे
दीखता शायद हू
पर
भीतर ही भीतर
मन मे
अमृत सी
रिसती है कविता
इसीलिए मै आदमी ...?
इस शहर मे -अब तक ,जीने लायक हू
{किशोर कुमार खोरेन्द्र }

कोई टिप्पणी नहीं: