सोमवार, 18 मई 2009

१६६-कविता-विरह

१-अपनी उगलियों को मारोडाहोगा
फ़ीर गिन कर देखा होगा
फ़ीर नजरे उठा कर
पास आ गयी रात के
वीरानेको -
कमरे तक
फ़ीर दिल तक
आने से रोकने के लीये
उठ कर
खिड़की को बंद किया होगा
हर करवट मे
एक् हाथ से
बिस्तर पे उसे धुडा होगा
यही सोचते -सोचते
की -
आज -क्या बात हो गयी
उनसे आजही क्यों --?
शेष मुलाकात रह गयी

क्या उसका भी यही हाल है
ये रात है की -
दरदो की बारात है
इस प्रथ्वी मे ही रह रहे है हम
पास -पास दीवान के
शहर मे -
सो रहें है हम
फ़ीर भी मेरे दिल को
ये कांटा क्यों चुभा -
शायद उसके मीठे बोल सुने बिना
यह
मन मचल रहा है
यह कैसीआग है
जिसमे उसकी भी देह
मेरा भी तन -
जल रहा
छूकर कभी
उसे देखूंगा ....
डर लग रहा मुझे
मै कही रख न हो जाऊ
क्या मै -
अब लपटों की चिता पर सो रहा
{किशोर }

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