बुधवार, 20 मई 2009

१७७-शान से जी सकती है

१-एक् शोख
मासूम
हसीं
लड़की हो गयी बड़ी
विवाह उपरांत
सुन्दर मिला पति
बड़ते -बड़ते-
एक् परिवार बना सुखी
उसमे
रंगों को ,शब्दों को
पहचानने की थी खूबी
एक् वो भी मुकाम आया
जब
उसको -अपना ख्याल आया
बचपन से यौवन तक के
उम्र ने
उसे बुलाया

लौटने पर
उसने पाया
ठहरे पंखो ने उसे बताया
अब भी -
वो उड़ सकती है
चुनकर एक्
शंख -
नए स्वरों से
अपने प्राण कोफुंक सकती है

गा सकती है
लहरों सा मचल सकती है
अंदर ही अंदर -एक् नयी यात्रा कर सकती है

जिसमे -रंगों के पहाड़ हो
शब्दों की नदी हो
अवचेतन मन की रहस्य -मयी गहराई हो

अपनी परछाई को
स्मृतियों के धागों से जोड़ कर
पतंग सा -
अपने जहां मे
उड़ा सकती है

पल्लू से -
माथे पर
उभर आये -भय के पसीने को
पोछ कर
शान से जी सकती है
एक् स्वतन्त्र ,पवित्र -मानसिक जीवन
आत्म विशवास- युक्त
{किशोर }

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