रविवार, 17 मई 2009

१६३-शैदाई हू

१-तेरा इन्तजार भी ,एक शीशा -ऐ -गिलास है
इसमे भरी लबालब सिर्फ़ विरह की प्यास है


२-तू कभी न आयेगी यह मुझे ज्ञात है
आ गयी अगर किसी रोज ,क्या बात है

३-महकता हूवा यह प्यार है

हर साँस मे तू मेरा संसार है

४-पानी पर खीच कर प्रेम की गहरी लकीर

कर गये मुझे सलाम
अब कहते है मिटा दो उस लकीर पर
लिखा हूवा उसका नाम


५-जान ले यह की मै तुझ पर ,सदीयों से फिदाई हू
जाना न मुझे छोड़कर मै ही तेरा शैदाई हू

{किशोर कुमार खोरेन्द्र }

कोई टिप्पणी नहीं: