गुरुवार, 14 मई 2009

१५४-राहगीर

नगर के जगमगाते उजाले
की रात
की लम्बी सुनसान
सडको
पर -एक राह गीर से
कोई खम्बा टकरा न जाए
भीड़ के कारन ट्रेन पर न चढ़ पाया
यह राह गीर
अपनी यातना की सारी व्यथा
आज
थकी हुवी रात से कही कह न जाए

कोई तो जगा होगा
आधी रात
जीवन के इस प्लेटफार्म मे

कहानी उसकी जिन्दगी की
सुबह तक अधूरी न रह जाए

कुछ लोग नगे फर्श पर

चादर ओढ़ कर सोये है
कुछ लोग लगता है
सपनो मे खोये है
कोईन्ही यहा सुनने वाला
इस ठण्ड मे
लगता है राहगीर के दर्द भरे
शब्द
कही
बर्फ बनकर फ़िर हवा मे न घुल जाए

{किशोर कुमार खोरेन्द्र }

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