सोमवार, 11 मई 2009

१४४-सदीयों पुराना मित्र

मेतुम्हारे माथे की चिंतित बिंदिया हू
तुम्हारे ओठो की ,विस्तृत मुस्कराहट हू




तुम्हारी आंखोके जल में तैरता हुवा खुशियों का पल हू

तुम्हारे मन में बसा एक् उत्तम पुरुष हू
जिसकी बाहों में तुम सशरीर समायी हुवी
निशचिंत
रहती हो



अपने अंतर -गृह में
अविरल बहते प्यार के आगोश मे
निडर रहती हो



मै तुम्हारे जुड़े मे
अटका हुवा
एक् सभाग्य्शाली
गुलाब हू





तुम्हारी चुडीयो की तरह बोलता हू
पायल की तरह संग चलता हू




मै दरअसल
बचपन से तुम्हारे संग हू




तुम नारी हो
मै
प्रतिरूप
तुम्हारा पुरुष सा अर्धांग हू

दुःख को देह की देहरी
पर छोड़कर
मुझसे केवल
सुख की बाते करती हो मै ही तुम्हारा मनमीत
अदृश्य
निराकार
पर अब
सचित्र
व्ही सदियों पुराना
मित्र हू {किशोर कुमार खोरेन्द्र }

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