मंगलवार, 19 मई 2009

हम दोनों

priy shankha jii
नमस्कार
अब आप पूर्णत स्वस्थ हो गयी है
अतः इस काव्य -श्रृंखला की
अंतिम कविता भेज रहा हूँ

आपने अपना कीमती समय देकर
बुखार होते हुवे भी मेरी कविताओं
को पढ़ने मे जो रुची दिखाई
वह प्रशंसनीय है ,मै
आपका तहे दिल से शुक्रिया
अदा करता हूँ ,
कैसी लगी यह काव्य -यात्रा
बताना न भूले
{वरना सवेरे वाली गाडी से चले जायेंगे }
-हम दोनों
१-बस या रेल
के
सफर सा
धरती की इस यात्रा मे
तुम
और
मै
पास -पास -बैठे
एक -एक -यात्री है

२-अपनी -अपनी देह की बोगी के भीतर
बैठे
आँखों की खिड़की से
झाँक रहे -
सूरज
चंद्रमा
पहाड़ ,नदी ,समुद्र
भीड़ -असंख्य पुरूष ,अनेक स्त्रिया

३-सितारों के समूह सा -
अन्नंत जीवो के बीच
तुम
और
मै
वायु के जल मे बहते -बहते
पहुच -गये है बहुत समीप -समीप

४-कारण होगा
एक सा हो
शायद
द्रष्टी-कोण करीब -करीब

५-पता नही
तुम्हे मेरे शब्द अच्छे लगते है
या
मै
पता नही मुझे तुम्हारी साडिया अच्छी लगती है
या
तुम

६-तुम भी कलाकार हो
रंगों की ,
शब्दों की
मै भी एक चित्र कार हूँ
शब्दों का

७-हो सकता है
मित्रवत
यह परिचय
मेरे शब्दों मे --रंग भर दे
या
तुम्हारे रंगों को अर्थ दे दे
और
सार्थक होजाये
यह मेल -मिलाप -हम

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