शनिवार, 9 मई 2009

१४३-घर ही है -असली तपोवन -

कभी मै ...
चश्मे या रुमाल सा -घर में ही खो जाया करता हू
सोफे या दीवान पर -किताबो सा चिंतित ,पडा रह जाया करता हू
अखबार के दुखी पृष्ठों पर -छपे खबरों सा ,कभी बिखर जाया करता हू
और तुम ...
मुझे धुड लिया करती हो ,समेट लिया करती हो
जन्म से मृत्यु तक की इस यात्रा में
मै कितना सच हू या कितना झूठ ...?
अब तक जान नही पाया
परन्तु
मानों ,मै दीपक हौऊ ,और बुझने से मुझे बचाने में लगी तुम्हारी उंगलियों .सा
मै भी
नुकीली लौ की आंच को -चुभता हुवा -महसूस कर रहा होऊ
हमेशा प्रेम के इस आग को -
निष्काम भाव के इस तपन को -
प्यास लगाने पार -तुम और मै -
सदेह ...
अमृत की तरह पी जाया करते है
टस से मस् नही होने वाले -
एकांत के ..
ऊँचे पहाडो के शिखर से -
जंगल से भी ज्यादा घने -अकेलेपन के दर्द से -
सूनी औए मौन -पटरीयो पर ...
ट्रेन की तरह दौड़ता हुवा ...
प्राय:
उस स्वप्नमय बीहड़ से -घर लौट आया करता हू -
तुम्हारे पास
मुझे मालूम है घर ही है -असली तपोवन -
स्नेह ,ममता ,आस्था --को पाकर
साकार खिलते है -भविष्य के सुमन
प्रेम है -
स्वजन के समक्ष -अपना ............?
एक् सजीव
मानसिक
परम आत्म समर्पण -
स्व का -अंहकार का विसर्जन
{किशोर कुमार खोरेन्द्र }

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