बुधवार, 6 मई 2009

१४२-दीप -शिखा सा वरण करे

दीप -शिखा सा वरण करे '

१-उसकी आँखों में प्यार का -नीला आसमान है
स्नेह के -हलके पीले रंग
वात्सल्य के -उज्जवल श्वेत रंग
के दिव्य लिबास को पहनी हुवी
वह
पवित्र माँ
मेरी
कवीता है
२-वह
स्वयं
टिमटिमाते सितारों के
प्रकाश सी झिलमिलाती
एक् रजत -आईना है
३-गर्म काफी को
पीने के पश्चात
महसूस हुवी -स्फुर्ती
की तरह
उनका -पवित्र दर्शन है
४-सुबह सैर को निकली
ताजी हवाओ की तरह
उनका -मीठा
शीतल स्पर्श है
५-वृक्ष की शाखाओं पर
घनी पत्तीयों के बीच
बिंदु -बिंदु -अंतरालों को
पार कर
आती हुवी
सूर्य -रश्मियों कि तरह
उनका
मेरे शीश पर
स्वर्णिम आशीर्वाद है
६-आकाश पर उभर आये
भोर के महा -दृश्य के सदृश्य
उनकी भव्यता के व्यक्तित्व को
अभिव्यक्त करने के लीये

मेरे पास
एक् कोरा कागज सा
साफ मन है

उनके
सदैव
चीर -स्थायी
सौन्दर्य की लालिमा के बखान के लीये
मेरी कलम में
वह
शाश्वत
स्याही का रंग है
८-फ़ीर भी प्रयास -रत् हू
९-माँ ..!
त्रुटी -यो को क्षमा करे
मुझे अपने
समक्ष
प्रज्वलित
दीप -शिखा सा
वरण करे /
{किशोर कुमार खोरेन्द्र }

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