सोमवार, 4 मई 2009

१४०-लौट आओ ..मै ही तुम्हारा देश हू

१-इतिहास के ठहरे हुवे
चट्टानों को
ऊँचे पर्वत की तरह
खड़ा कर
२-परम्परा
के जल को
गहरी नदी मे भरकर
३-सभ्यता की इमारतो को
महानगर मे बसाकर
४-मै
एक खेत
धान सा
ज्वार सा
अब भी उग रहा हू
धतूरे
बबूल
कनेर
कपास
पलास
सा अब भी
खिल रहा हू
५-फसल की जडो मे
भरा रस
प्रीत हू
कृषको की थकान को दूर भगाता
सुसंस्कृत
लोकगीत हू
६-इतिहास को ठहरे रहने दो ,
परम्परा को मंथर गति से बहने दो
सभ्यता को गगन चूमने दो
७-मै
गंगा -जल रहित
शुष्क रेत नही
दूध सा धवल
करुणामयी आँख सा सजल
वेद सा पुरातन
परीश्रमी

पवित्र पसीने से तर

माटी

से भरा खेत हू
लौट आओ
मै ही तुम्हारा देश हू

{किशोर कुमार खोरेन्द्र }

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