शुक्रवार, 1 मई 2009

१३६-स्वपन के भीतर और बाहर

१-आसमानी साडी के
हल्के केशरिया रंग के
आँचल से
ढके
तुम्हारे स्वर्णिम माथे से
सुबह के सूरज की तरह
झांकती
लाल -गोल -बिंदिया
छितिज की तरह
मुझसे दूर भागती है
मै दौड़ता हुवा
अक्सर
तुम्हारे पास खडे
गहरे हरे रंग के पत्तो से
आच्छादित
वृक्ष तक ही
पहुच पाता हू
सपने के भीतर यही होता है
उस वृक्ष से टपके सागौन के
पत्तो की
महीन -नसों मे
शायद तुम्हारे द्वारा बुना गया
एक् मानसिक मधु-स्मरण छुट गया हो
एक् प्रेम -पाती सा मेरे नाम
२-सपने से बाहर
जागरण मे
चलते -फिरते
आँगन मे
बहते हुवे
मेरे एकाग्र -चित्त चिंतन मे
मुझे लगता है
तुम
मेरी खोयी हुवी बांसुरी हो
और मेरे अधर
ब्याकुल है ,आतुर है
फ़ीर डूबने को
उसी गोकुल -वृन्दावन
सी मीठी तान मे
तुम राधा मै किसन
और बैठे हो -यमुना तीर
एक् साथ मे ॥
अक्सर यही होता है
स्वप्न के भीतर
या स्वप्न के बाहर
हर याद मे
{किशोर कुमार खोरेन्द्र }

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