रविवार, 31 मई 2009

नाम और आकार

नाम और आकार देखना तुम्हारे पाँव कांच केटुकडे मे न पड़ जाए मुझे -बहुत दर्द होगा कोईबबुल कांटे की तरह तुम्हारी बाहों को खरोच न दे मै छिल जाऊंगा अगर कोई सपना तुम्हारा टूटा हुवा आँगन मे मिल जाए तोमुझे बता देना उसे मै -बीज की तरह -फ़ीर बो दूंगा शायद तुमने मुझे .....?क्या .....किसी ने नही देखा होगा मै तुम्हारे सबके हमेशा पास हूँ बहुत करीब इतने समीप की मुझे भुला कर ही तुम जीसकती हो जैसे मै जल होऊ पीकर मुझे तुम्हें भूलना तो होगा ही प्यार के अनेक नाम और आकार है उनमे से जो चाहो मुझे समझ लो {किशोर कुमार खोरेन्द्र }

यमुना तीर

यमुना के तीर 1- बिदा कर दोस्तों को लौटते -लौटते अब किसे दूंड रही हो प्लेटफोर्म मे २-माल मे सड़क मे या बाजार मे मुझे मत खोजो ३-रेस्टोरेंट मे दोसे की खुसबू की तरह मुझे मत सुंघा करो ४-मै कोई रसोगुल्ला नहीजो तुम्हें किसी डिब्बे मे बंद होकर -मिल जाऊ ५-मैतुम्हारे -दफ्तर मे फाईल से गिरा हुवा एक् पन्ना नही हूँ जो तुम्हारे हाथ लग जाऊ ६-या किसी सिटी -बस मे तुम्हारी बगल मे बैठा -नजर आउ७-मै तो जंगल का एक् फूल हूँ पग -डंडियों पर उड़ता हुवा धूल हूँ पर्वतो के पीछे से -उगता हुवा सूर्य हूँ ८-एक् बहुत पुरानी वो किताब हूँ जीसे बस पढ़ते रहने का ही मन करता है ९-यदी तुम्हें मुझसे मिलना है तो चली आना -यमुना के तीर बहे जहां -ओढ़कर कदम्ब की छवी चांदी सी झिलमिलाती नीर {किशोर }
१-वृक्ष से
फल
और
नदी से
जल
वृक्ष और नदी से -यह कहने मे
तो कोई हर्ज नही है की -
मै तुमसे प्रेम करता हूँ
२-उत्तर मे वे और फल और जल देते
है परकहते कुछ नही
३-मुझे चाहिए शब्दों से बने उत्तर
मै मनुष्य हूँ
मुझे मन भर शब्द चाहिए
शांतिमय परिणाम नही
४-मै भगवान् की मूर्ती के पैरों पर गिर पङता हूँ
रोता हूँ गिड़गिड़ता हूँ
वे देते है मुझे मौन के बगीचे से तोड़कर -
एक् और शांतिमय जीवन
५-पर मुझे उनका मूक आर्शीवाद
नही
चाहिए होता है प्यार का
सस्वर उच्चारण
६-लेकीन हर हाल मे या परिणाम मे
मुझे तो यही लगता है कि-
प्रतिउत्तर मे प्रेम इस जग सरोवर के पंक मे
खिले हुवे कमल की एक् चुपचाप -मुस्कराहट


है
७-या
इस ब्रह्माण्ड के एकांत के जंगल की
विराट सकारात्मकसजीव -मौन स्वीकृति है
शायद तुम भी उस स्वीकृति की
एक् अनुकृति हो


[किशोर कुमार खोरेंद्र }

मुझ क्या चाहिए

Kavita –
mujhe kya chahiye

Mujhe kyaa chahiye
Bas ek baar Apani god me sar Rakhane देना
Mae apani chir nindra puri kar लूँगा
Mujhe kya chahiye
Bas ek baar Apane pyaar se Bhare aanchal को
Thand lage mujhe to Odhaa देना
Kampate dagmagate man ko sthirkar lunga
Mujhekyaa chahiye
Bas ekbaar Apaniankho me Mujhe Samucha ankit करलेना
Fir is jahaan me
Rahu yaa n rahu
Khud ko paa lunga

{Kishor }

जब तुम नही दीखती

Jab tum nahi dikhati “Jab tum nahi dikhati Baadal ke ek tukade saa –Chhat par Yaa Jab tum nahii jhankatii Kautuhal –vash Khidakii ke paar Varshaa ki giratii bundo ko Tab meri aankho me Bhar aataa hae Suna aakaash Akela vriksh Khalimaedaan Aur tab udaas saa mae Yu hii Pahunch jata hu Tumhe bhulane Kii koshish me Baethaa rahataa hu Khud ko niharataa Jaese talkies me Yaa kisi dost kiibate suntaa rahataa hu baethkar sahiil me par is baat ko tere sath ko koii nhi jantaa yhaan tak kit um bhi nhii {kishor kumar khorendra }

post scrap cancel

गुरुवार, 28 मई 2009

मै कौन हूँ ...

पेज -५-

Haan ,prem tumhaari or svyam Bahata hae /Unko yah dar hae Bhulu kahii n unko So bandhan me rakhate ve ,nahii akela /Din rat jutaaye rahate ha eve mela Din pr din kitane din Bite jate hae Lekin tum padate hamko nhii dikhaii Kab tak karate jaoge –avhelaa /Mae rahata jane kismeKahaan magan hu Karata ya karata nhii Bhajan pujan hu Par prem tumhara mujhe n chhodegaa Nishchay hii mujhako apane se jodegaa /Manse yh aasha kbhi nhi jaati hae Bas yahi yahi Sachchii meri thati hae {gitanjalise –ravindra nath thakur }

मै कौनहू

Page-4

Janm se purv mae kyaa thi
Mera atit kya raha hoga
Aur ab to mae mritu ke bare me sochkar hii achambhit rah jaatii hu
Sare dukh,aur such ,maa pita bhai pati,bachche ,mitr –ye ghar
Sab kuchh jaese dekhate –dekhate hii meriiaankhoke samaksh
Ek din mujhase chin jayenge
Mano mae sare drishyo kodekhatii hii rahungii aur kisi gahare
Jal me dub jaaungii

Pata nhii mritukaa vah divas –barso bad aayega
Yaa mahino bad yaa kal
Kuchh bhii to nischiit nhii hae –is jivan me

Mae bhi kaesii hu jo aap logo ko janm –din par hii
Mritu ke bare me batane lagi hu

Janm ke baad ke itane baras mere kis prakar vytit huve –
Ab mae yhii batane jaa rahii hu

“jo prem mujhe is “

Jo prem mujhe is
Duniya me karate hae
Hae unake bandhan kade
Kathin sharte hae /

मेकौन्हू ..

Page-3 mae kaun hu ….shankh !

Durga puja kii raunak kii samapti ke pashchaat ,dipavali me bhi
Colcatta jagmagane lag jata hae

Lakshmipuja ke din –aarambh keprath me hii 7actober ko {abase 51 vrsh purv }
Ek nanhi kaya sahit mera janm huva ,shahar me ek aur nayi roshani ne
Pdarpan kiya tha


Mujhe sabne kha ghar me lakshmi aayi hae ,ekbhai ko rakhibandhane vali ek bahanmilgayi thi

Maa pita ,bhai,ke sath jindagiko ,sakushal age to badana hi tha

Parantu ek prashan us din se aajtak ,mere man me ruka huva hii hae –

तुम्हे कुछ याद आया

१-स्कुल के सामने
जब तुम
चाट खा रही थी
मिर्ची के कारन जीभ जल गई थी
तब
पानी का गिलास लिए मै ही तो खड़ा था

तुम्हे याद नही


२-सुनी सड़क से लौट रही थी
मन ही मन डर रही थी
टायर पंचर हो गया था
तब सायकल सहित घर तक
तुम्हे पहुचाने मै ही गया था
तुम्हे याद नही

{किशोर }

मौ कौन हूँ ...

{page -5 mae kaun hu …shankha …!}



Mae to krishn ke rang me rang gayii hu

Apane ghar ke dvar par khadii huvii –unka intajaar karate huve
Suni pagadandi ko nihaar rahii hu

Jabse tumse {janmo se }bichhudi hu ,mujhe chaen nahi mila hae

Bhojan me bhi svad nahiaata hae ,meri aankhe bhi nind nahi aane
ke karan murajhaa gayii hae

mae to shayam jii ke shri ‘CHARAN-KAMAL”kii dasi hu

aesa koii vykti hae jo turant unake aane kii khabar mujhe de


mira ne –
svyam ko kho diya tha
ahankaar uname bacha hi nahi tha
Krishna ke smaran mr ve is tarah dub gayi ki ..svayam shayam ban gayi

Aur yahi bhakti yaa prem kaa fal hae

Prem bhav hae ,at: use bhav rup me hi hm paa sakate hae

Prem me deh yaa aakaar gaun hae ,
Pradhaan hae to –usaka chiir aabhaas

Lekin yhi prem bhavatmak rup se do vyktiyo ke bich bhi ho sakata hae

Udaharan –ram Krishna paramhans aur svami vivekanand
Ye to mahanatam naam huve ,parantu is sansar me aneko aese vykti hae
Jo aaps me prem karate hae –parantu is mayavi jag me –ve apragatit
Hi rah jaate hae


{Shesh bad me …contd }

रविवार, 24 मई 2009

कविता -स्वप्नों का सार

"स्वप्नों का सार " -1-क्या तुम आती-जाती लहर हो जिसके दिव्य स्पर्श का होता रहता आभास मुझे दिन रात २-क्या तुम ही हो वह सागर का विस्तार जिसमे मैने पा लिया है तुम्हारा प्यार अपार ३-क्या तुम व्ही मुस्कराहट हो जो डालफिन मछली सी करती रहती है निरंतर मेरा पीछा -सुबह -शाम ४-क्या तुम्हारा नाम ही मेरे हाथो को थामा हुवा वह -है पतवार जिसने मुझे ला खडा किया तुम्हें जान एक् खुबसूरत मंझधार ५-अब मुझे आगे की मेरी सम्पूर्ण यात्रा तुम्हारे आकर्षण की चुम्बकीय -सुई की नोक के मार्ग -दर्शन पर करना है साभार ६-तुम हो प्रकृती मै हूँ तुम्हारे सौन्दर्य की धुप के स्वर्णीम रूप -जाल मे -लापता एक् नाविक के स्वप्नों का सार {किशोर कुमार खोरेन्द्र}

१८७-प्रिय है

"प्रिय है "
उन्हें देखा नही कभी फ़ीर भी सीता और राम मुझे प्रिय है उनका नाम मुझे प्रिय है राधा और श्याम मुझे प्रिय है कभी लगता है -मीरा के एक्-तारा सा -बज रहा हूँ सुना नही पर -कृष्ण की बांसुरी की तान प्रिय है राधा जी की -छम छम -चाल प्रिय है वैसे ही -तुम से मिला नही कभी पर लगता है ख्वाब सी -तुम भी हो तुम्हारी हर बात प्रिय है मुझे राम -राम का नाम प्रिय है

_{किशोर कुमार खोरेन्द्र }

१८६-कविता -हर भावः मे कृष्ण है

१-हर भावः मे कृष्ण है विरह मे संयोग मे संजोग मे -कृष्ण हैं २-यमुना तट पर कदम्ब की डाल पर बांसुरी की तान पर -कृष्ण हैं ३-गोधुली बेला मे पर्वत मे वृन्दावन मे कृष्ण है ४-मेरे प्यार मे मेरे तकरार मे मेरे व्यवहार मे -क्रष्ण है ५-जित देखू तित हर पग मे मेरे मन -संसार मे -कृष्ण है ६-कहाँ जाऊ कहा छिपू अब तो मेरे -हर स्वभाव मे कृष्ण है ७-नयन मे तुम अधर मे तुम नस -नस के रुधिर मे तुम मुझे कान्हा तुम्ही आकर बताओ -कहा नही हो तुम यहा तो लग रहा -बूंद -बूंद मे कण -कण मे -कृष्ण है ८-माँ की ममता मे पिता के सरक्षण मे पत्नी के प्रेम मे पति की चाह मे भाई के स्नेह मे मित्र के स्मरण मे बच्चो की मधुर मुस्कान मे कृष्ण है {किशोर कुमार खोरेन्द्र }

१८५-कविता -श्री राधे -राधे

radhey -radhey"1-radhe radhe karate krishn huve vyaakul jamuna ke tir ab banshi bajaye kaese madhur kadam ki dali puchhe kya huva radha kitni hae dur bole kanhaiyaa gusse me ,mae kya janu jaa usi se puchh 2-tab ek uchi tahani ne jhaank kar dekha thi bahut dhup yamuna ki lahare bhi taras rahi thi dekhne shri rup ndiya ke us paar ne tabhi bataya aa rahi baj rahe nupur bansuri ne tab kaha kanhaeya jaldi ab lagao ek sundar sur / {kishor kumar khorendra }

शनिवार, 23 मई 2009

१८४-

बिंदीया "
मैने नही
कहा
फ़ीर भी वहव्ही रंग की साडी पहन लेती है
जीसे मै पसंद करता हूँ
और छम से आ धमकती है
कभी मेरे समक्ष
मै तब किताब के शब्दों मे -एक् पन्ने सा रहता हूँ अटका हुवा
वो छीन लेती है मुझसे किताब
और अपनी आँखों को और बडी कर कहती है
अब पढो न -साबुत ताजी कविता
मै उसके रूप की गरमी से हुवा पसीना -पसीना
सोचता हूँ कितना मुश्किल है इसके बिना मेरा जीना
अब सचमुच मे वक्त मुझे धकेल कर उसकी गोद मे
आगे बढ़ जाएगा

वह कुवे से पानी ऐसे निकलती है
जैसे बाल्टी मे मै पानी की जगह भरा हुवा हौऊ
एक् बूंद भी प्यार छलक न पाए
मुझे देखते ही उसकी सुस्त चाल तेज हो जाती है
आप से आप गिरे आँचल को वह -सभालने लगती है

नारी माँ है
बहन भी है

लेकीन प्रकृति का -एक् ऐसा रंग भी है
जिसके बिना पुरुष की नजर मे -
यह व्यापक सौन्दर्य कितना अधूरा है
मानो----
सौन्दर्य एक् चेहरा हो
और नारी ...उसके मस्तक पर लगी
एक् शोभायमान ....बिंदिया हो

{किशोर कुमार खोरेन्द्र }

१८३-मतलब एक् ही है

मतलब एक् ही है
मुझ अहले- दिल के
पास एक् -हसीं जान
है सितारों के कुछ -चमकीले अरमान है
इस धरती के सुन्दर ख्वाब है
फ़ीर भी तुम्हें चाहिए एक् सुंदर काया तो
मुझे -अपने मन की आँखों से देखना
ऐसे भी मै तुम्हारा ही आईना हूँ
अपने सामने मुझे खडा कर अपने आप ही को देखना
फ़ीर भी यकीन न हो मेरे हुस्न पर-तो
अपने इश्क को मेरे लीये और अजमा के देखना
मेरे चश्मे के पीछे मेरे नही -तुम्हारे नयन
है मेरी देह के भीतर -बाहर मेरी नही तुम्हारी आत्मा है
रूप और सौन्दर्य है

हर बच्चा हर माँ का जैसे दुलारा है
हर माँ हर शिशु को जैसे प्यारा है
वैसे ही चाहने वालो की दुनिया मे -
हर प्रेमी एक् सितारा है

इसलीये मै तो कहता हूँ -
अब दर्पण नही मुझे देख लिया करना
क्योकी सुन्दर व्ही जीसे प्यार मिल जाये
हुस्न को इश्क मिले

या
इश्क को हुस्न मिल जाय
मतलब तो एक् ही है
तुम अगर वाक्य-इश्कहो तो मै हुस्न हूँ ही /

{किशोर }

१८२-तुम मुझे कितना चाहती हो

१-एक नदी
की
कल्पना मे -
सिक्को की जगह -अपने छोर मे
जीने लायक यादगार पलो को
बाँध कर रखे -मेरे रुमाल को
तुमने -थामा नही
पानी मे बह जाने दिया
२-एक पहाड़ के स्वप्न मे
चोटी पर पहुच चुके -मुझे
वापस लौटने के लिए
एक पगदंडी को मेरे साथ
जाने से माना कर दिया
३-एक जंगल के चिंतन मे
तुमने मुझे
पेडो की छः से वंचित रखा
४-सपनो मे भी
kalpanaa -ओ मे भी
मनन मे भी
तुम कभी -नदी को प्यार की
छिटो की तरह -मुझ पर उडेलती रही
मै तुमसे दूर न चला जाऊ
इसलिए -पहाडो को भी
merii राह मे -
रोडे की तरह अटकाती रही
जंगल के मौन से
कभी -कभी मुझे डराती रही
५-सताते उसी को है
जिससे प्यार अधिक होता है
तो मै जान लू की
तुम मुझे कितना चाहती हो
{किशोर कुमार खोरेन्द्र }

शुक्रवार, 22 मई 2009

अब रखा है आंच पर

१-अब रखा है

आंच पर -

प्यार

उसे चुप-चाप पकने दो

या -अंकुरित हुवे

मुझ गुलाब के -

नन्हे ,---इस सच्चे पौधे को

तना ,...शाखाओं ,...पत्तियों ,....का आकार

धर लेने दो

ह्रदय के गमले मे ही सही

एक दिन ....जब ...प्रेम ....सुमन बन कर

तुम्हारी पूजा की थाली मे ......सज जाए

तब तुम भी .....उसकी ..सुगंधा ..बन जाना

एक हंस ......हंसा से .....यही चाहेगा

तन्हाई की बिछी रेत .....पर ...पडा ....एक श्वेत शंख

अपने समर्पण के प्रति- दान मे

एक -भव्या ,चिर स्मिता ,अपराजिता ,ममता की मूर्ती ,

स्नेह और सौन्दर्य की देवी शंखा से

और क्या चाहेगा ......

{किशोर }

अब रखा है आंच पर

भ्रम था

बहुत दिनों तक
जब
मै नही लिख रहा था
कविता
समुद्र से कुछ दूर
तटीय रेत पर
एक मछालिकी तरह जी रहा था
तड़फ रहा था
मेरे सपनो को लोग
अपने जूतों से कुचल रहे थे
दिन .....
सबह सुबह
मुझे हांकता हूवा
ले जाया कराता था
और
शाम -होते होते
एक खाई
या स्याही से खाली
हो चुके -रिफिल की तरह
छोड़ जाया करता था
माह
फ़िर इसी तरह -बरस बीत गए
गुलाम बन चुके इस जिस्म
से निजात पाना चाह रहा था
मै पिजरे मे कैद
एक चिडिया की तरह
रेत पर तड़फती
एक मछली की तरह
उड़ना
और तैरना
चाह रहा था
लेकीन
मुझेअपने -आकाश
और समुद्र की ख़बर ही नही थी
सचमुच मै ही
पंख और आकाश
मछली और समुद्र ..था
जब चाहे उड़ सकता

तेर सकता था
पिंजरे की उपस्तिथी
रेत का होना
भ्रमो की इस दुनिया मे
मात्र
एक भ्रम था
{किशोर }

१८२-कविता -

बहुत दिनों तक

जब

मै nhii

likh raha था

समर्पण

शब्दों का आकाररूप
ही तो मनुष्य है
यदि शब्द निराकार रूप मे
मन्त्र है तो-
साकार रूप मे
प्रेम ,ममता ,
स्नेह की -पूजा
के लिए
किसी पाषाण केबदले
किसी मनुष्य का चुनाव भी सत्य है
सम्पर्पण ही प्रेम है
{किशोर }

गुरुवार, 21 मई 2009

बहुत प्यार होगा

1बुखार नही होगा
एक उन्हें
कमजोरी का अहसास होगा

२-काम बहुत करती है
काम भी डर से कापते हुवे
उन्ही के
आस-पास होगा

३-वो ख़ुद को
अपनी
एक अनलिखी
कविता की तरह
पढ़ रही होंगी
उस कविता मे
कुछ न कुछ ख़ास होगा


४-या
एक नया
रंग चुरा रही होंगी
इन्द्र -धनुष से
इस बार
उनकी साडीयो मे
प्रेम और ममता का
नया -मिश्रित्त
रंगीन आभास होगा


५-भीतर ही भीतर
बुन रहा होगा
इस तरह से कुछ
नूतन
उनका मन
रंग और शब्दों को भी
लगता है
उनसे
बहुत प्यार होगा

{किशोर ]

दर्द एक नया होगा

१-लाख पूछेगी हवा
मुझे
पर लबो पे
उसका
कभीं न नाम होगा

२-मेरी आँखों मे झूलता रहेगा
उसका शहर
पर
किसी के सामने
वह शहर
कभी न याद होगा

३-उसका घर
मेरे गाँव से बहुत दूर है
मै रहता हूँ उदगम मे
वो रहती है सागर तट मे
यह एक बहाना भी
उससे
न मिल पाने के लिए
हरदम
मेरे पास -होगा

४-कभी भूल से
इधर
निकल आए वो कही
लोंग कहेंगे
यह वही है
मै तब कहूंगा -
वो कोई और है
यह वह नही है

५-हर बार की हर कहानी की तरह
यह कहानी भी
अधूरी रहेगी
अंजाम भी वही
सदियों पुराना होगा
लेकिन
हमारे -
जाने के बाद
हर शख्स के सीने मे
दर्द
एक नया होगा

{किशोरकुमार खोरेन्द्र }

बुधवार, 20 मई 2009

एक gul

1-vah
gul hasin hae ,..usaka ek hi hamdam hae

khuda ne is gul ki umr tay kr di hae

lekin kathin tap kar
usae hamdam -mitr ,bbhavare ne
khuda se
yh vr mang liya hae ki

'SHESH MERI UMAR GUL KI UMAR ME JUD JAYE "






2-PHOOL KII SUGANDH SE , BECHARA HAMDAM
MADHOSH HAE
PREM ME DUBI HUVI HAVA BHI HAE
BASANT KAA MAUAS BHI HAE





3-AESE ME
bhavara bar -bar
apni gul ka chakkar kat raha hae





4-ishak ka junun dekh
pankhuriyaa laaj se
jhuk gayi hae
jaese uski deh ke dvar
pyar ke liye khul gaye ho



5-sham ka samay hae
phool ka rang chatak lal hae
pr
usake hamdam bhanvre ka shayam rang
shvet hota jaa raha hae
mano
rat ke liye sham ne usake rang ko chus liya h






6-bhanvara phool kii jado ke paas
achet pada hae
shayad
ab
kabhi n uth paye
pr
lal jode me sajhe gul ko
basant ki
is chandani rat me
apane hamdam
ka ..intaj..a..r ..hae

kya yhi intajar
pyar hae

{kishor }
it is a short story ..please say ..do u like it ?
or its ending is bad ..?
are chinta n kro
endings r in our hand
we can change it any time -
according to our convenience



{किशोर }

१७८-पहरा

पहरा

१-बैठ कर
इंतजार के चेयर मे
सोच रहा हूँ
क्या -
यही होता है प्यार मे
२-भूल जाते है स्वयं को
खो जाते है
उनकी याद मे

३-सरकता हुवा एक् पत्ता
आँगन से आया
मुझे
कुछ कह गया
उसके हाथो के
कोमल स्पर्श सा -
छू गया

मेरी यादो मे
उसका नाम -
पहले आता है
या -खुबसूरत चेहरा
बताना मुश्किल है
अब तो
मेरी रूह तक है

उनका -पहरा

{किशोर }

१७७-शान से जी सकती है

१-एक् शोख
मासूम
हसीं
लड़की हो गयी बड़ी
विवाह उपरांत
सुन्दर मिला पति
बड़ते -बड़ते-
एक् परिवार बना सुखी
उसमे
रंगों को ,शब्दों को
पहचानने की थी खूबी
एक् वो भी मुकाम आया
जब
उसको -अपना ख्याल आया
बचपन से यौवन तक के
उम्र ने
उसे बुलाया

लौटने पर
उसने पाया
ठहरे पंखो ने उसे बताया
अब भी -
वो उड़ सकती है
चुनकर एक्
शंख -
नए स्वरों से
अपने प्राण कोफुंक सकती है

गा सकती है
लहरों सा मचल सकती है
अंदर ही अंदर -एक् नयी यात्रा कर सकती है

जिसमे -रंगों के पहाड़ हो
शब्दों की नदी हो
अवचेतन मन की रहस्य -मयी गहराई हो

अपनी परछाई को
स्मृतियों के धागों से जोड़ कर
पतंग सा -
अपने जहां मे
उड़ा सकती है

पल्लू से -
माथे पर
उभर आये -भय के पसीने को
पोछ कर
शान से जी सकती है
एक् स्वतन्त्र ,पवित्र -मानसिक जीवन
आत्म विशवास- युक्त
{किशोर }

मंगलवार, 19 मई 2009

१७६-जब तू आयेगी

जब
भी
तू -आयेगी

मै
तेरी हथेली पर
मेहंदी सा -
रच जाउंगा

तब
मौसम
रंगों का ही होगा
तेरे
कदमो पर
फूलो सा -
बिछ जाउंगा

तब
अपनी मुस्कराहट से
कुछ -तब्बस्सुम
मुझे भी -दे देना

मुन्तजिर मे तेरे
चुप हूँ
मगर -मेरी शोख अदाओं को
उस रोज
तू-देख लेना

जानता हूँ
तू -हसीं है
हुश्न है
लेकीन-इश्क को
पूरा मेरी आत्मा कीकिताब से
-पढ़ लेना

तू अगर मोती है
तो
अपनी चमक
मेरी आँखों मे

देख लेना

जब आयेगी
तू
उस दिन

{किशोर }

हम दोनों

priy shankha jii
नमस्कार
अब आप पूर्णत स्वस्थ हो गयी है
अतः इस काव्य -श्रृंखला की
अंतिम कविता भेज रहा हूँ

आपने अपना कीमती समय देकर
बुखार होते हुवे भी मेरी कविताओं
को पढ़ने मे जो रुची दिखाई
वह प्रशंसनीय है ,मै
आपका तहे दिल से शुक्रिया
अदा करता हूँ ,
कैसी लगी यह काव्य -यात्रा
बताना न भूले
{वरना सवेरे वाली गाडी से चले जायेंगे }
-हम दोनों
१-बस या रेल
के
सफर सा
धरती की इस यात्रा मे
तुम
और
मै
पास -पास -बैठे
एक -एक -यात्री है

२-अपनी -अपनी देह की बोगी के भीतर
बैठे
आँखों की खिड़की से
झाँक रहे -
सूरज
चंद्रमा
पहाड़ ,नदी ,समुद्र
भीड़ -असंख्य पुरूष ,अनेक स्त्रिया

३-सितारों के समूह सा -
अन्नंत जीवो के बीच
तुम
और
मै
वायु के जल मे बहते -बहते
पहुच -गये है बहुत समीप -समीप

४-कारण होगा
एक सा हो
शायद
द्रष्टी-कोण करीब -करीब

५-पता नही
तुम्हे मेरे शब्द अच्छे लगते है
या
मै
पता नही मुझे तुम्हारी साडिया अच्छी लगती है
या
तुम

६-तुम भी कलाकार हो
रंगों की ,
शब्दों की
मै भी एक चित्र कार हूँ
शब्दों का

७-हो सकता है
मित्रवत
यह परिचय
मेरे शब्दों मे --रंग भर दे
या
तुम्हारे रंगों को अर्थ दे दे
और
सार्थक होजाये
यह मेल -मिलाप -हम

१७४-हम दोनों

१-बस या रेल
के
सफर सा
धरती की इस यात्रा मे
तुम
और
मै
पास -पास -बैठे
एक -एक -यात्री है

२-अपनी -अपनी देह की बोगी के भीतर
बैठे
आँखों की खिड़की से
झाँक रहे -
सूरज
चंद्रमा
पहाड़ ,नदी ,समुद्र
भीड़ -असंख्य पुरूष ,अनेक स्त्रिया

३-सितारों के समूह सा -
अन्नंत जीवो के बीच
तुम
और
मै
वायु के जल मे बहते -बहते
पहुच -गये है बहुत समीप -समीप

४-कारण होगा
एक सा हो
शायद
द्रष्टी-कोण करीब -करीब

५-पता नही
तुम्हे मेरे शब्द अच्छे लगते है
या
मै
पता नही मुझे तुम्हारी साडिया अच्छी लगती है
या
तुम

६-तुम भी कलाकार हो
रंगों की ,
शब्दों की
मै भी एक चित्र कार हूँ
शब्दों का

७-हो सकता है
मित्रवत
यह परिचय
मेरे शब्दों मे --रंग भर दे
या
तुम्हारे रंगों को अर्थ दे दे
और
सार्थक होजाये
यह मेल -मिलाप -हमारा

{किशोर }

सोमवार, 18 मई 2009

१७२-कविता -तुम कौन

तुम कौन

१-तुम कौन
एक् अपरचिता
या
चिर परिचिता
२-जीवन की इस भाग -दौड़ मे
उहा -पोह से
भरी दिन -चरयाओ मे
आतीहो
प्रतिदिन
हर प्रात की बन शुभ -चिंता
३-रात सपनो के
जंजीरों से
या
फ़ीर -विशाल तम -आकारों के भय से
मुक्त होते ही
मेरे नयनो के द्वार खडी
तुम लीये मुस्कानों की आरातीका दिया
मुझे लुभाती हो
मेरे मन आँगन मे
हर दिन
-एक् रंगोली से बनी
सौन्दर्य की देवी की बन प्रतिमा
४-तुम्हें अगर प्रिय मित्र कहु
तो यह लघु विशेषण होगा
तुम्हें अगर अपनी सहृदया कहु तो
तो यह मृदु -चिंतन होगा
तुम्हें यदी
मै
अपनी
सखी कहु तो यह अति -उत्तम होगा
५-हे मेरी प्रिय सखी
शायद
हम दोनों है
जन्मो से बंधे -बधी
६-अब तो कर लो
अपने नयन -करो से
मेरे खिले प्रेम- सुमन को
समझ
एक् सखा का
पवित्र समर्पण सही
{किशोर }

स्वीकृति

किशोर कुमार जी , आपकी रचना हमें प्राप्त हो गयी है तथा जून माह की कविता प्रतियोगिता में शामिल कर ली गयी है । सहयोग के लिए धन्यवाद । प्रतियोगिता के विजेता की घोषणा जून माह के प्रथम सप्ताह में हम कर रहें । आप अपनी रचना साहित्य मंच पर प्रकाशित करा सकते हैं ।
संचालक ( हिन्दी साहित्य मंच ) नई दिल्ली

१७१-पूजा और बडाई

पूजा और बडाई

१-उस पार प्रिये
तेरा
इस पार प्रिये
मेरा
घर है
दोनोंके बीच
बहती नदिया
की नापी न जाये
इतनी है
गहराई

२-इस जल मे
सब
रहते है
माता -पिता
बहन
पति- पत्नी और भाई
बिना रिश्तो के
जीने मे
किसी को भी
प्रसन्नता कभी न आई

४-सात्विक प्रेम भी
अनबूझा रह जाता है
रिश्ते दारो का
मोह कभी भी
जाग जाता है
छोड़ उन्हें जो
जीना चाहते है
वो सब पीछे -पछताई

५-मिलना भी एक् पहेली है
जान ले तू तो
मेरी
प्रिय सहेली है
बात समझमे आयी

६-सोच समझ कर मिलना
सयम रख कर जीना
खुश होना पर
वियोग मे मत करना
तुम ज्यादा -रुलाई

६-ये जीवन है -एक् तपस्या
जो नर -नारी -सयम से मिलते है
जग वाले उनकी
करते है
पूजा और बडाई

{किशोर }

१७०-तुम्हें खुश देखकर

तुम्हें खुश देखकर
मै भी
खुश हो गया

एक् ज्योति से
मै बाती मिलकर
मै भी
ज्योत
सा जल गया

अब हम
अखिल ब्रम्हांड
की
आरती मे
संग -संग
एक् दीपक सा जलेंगे
और पूजा की थाली होगी
यह धरा

तुम सहचरी मेरी
बातीसा जलना
मै
रहूंगा
आधार तेरा
बन
संगी
एक् माटी का दिया
अविरल स्नेह भरा

इसे एक् प्रेम पाती भर न
समझाना
यह है बाती के.....
गर्म ओठो से
माटी के सरस अधरोका
चिर आलिंगन -प्रिये ....खरा
{किशोर कुमार खोरेन्द्र }

१६९-कविता -राधा रानी को मनाऊ कैसे

१-राधा रानी
को मनाऊ कैसे
मैने ही तेरी मटकी फोडी
बताऊ कैसे

२-एक कांटा बबूल का
तेरी राह मे
मैने ही रखा था
समझाऊ कैसे

३-यमुना तट पर
कदम्ब की डाल से
लटकी
झूले की रस्सी
मैने ही ढीली की थी
अब
गिरने पर उसके
उसका गुस्सा देख
ताली बजाऊ कैसे

४-गोपियों के संग
रास रचाया
जान गयी राधा
अब अपना यह भेद
छिपाऊ कैसे

५-हे राधा
रानी
तू है
मुझे सबसे प्यारी
तुझ बिन
कभी न होगी पूरी

मेरी कहानी
{किशोर }

१६८-कविता -अब तुम एक बाँसुरी हो

१-अब तुम एक बांसुरी हो
मधुर सुर से
भीतर ही भीतर
गूंजती हो

२-यह गूंज -
परम चेतना की समस्त सजीव
धडकनों
का
समवेत स्वर है
एक महातान है

३-तुम्हे सब सुनायी देता है
दिखायी देता है
असंख्य लोग
वनों ,पर्वतों ,
नदीयो ,सागरों
पर
पड़ता हूवा दिव्य आलोक

४-अब तुम इस जग रूपी -आईने से बाहर हो
छूकर
देखो
मै तुम्हारे करीब -तुममे
तुम्ही मे
या तुम ही तो हूँ

{किशोर }

१६७-कविता -मैने देखा एक सपना

१- मैने देखा
जागते हुवे
एक् सपना
२-तुम्हारा तड़फते हुवे -
रात भर जगना
कभी घुटनों को मोड़कर
कभी करवटे बदल कर
रात भर
जागने के लीये
सोने की कोशिश के
बहाने करना ...

३-कभी उठ कर
आईने के सामने
स्वयम कोनिहरना
क्या मै व्ही हूँ
कितनी बदल गयी हूँ

४-मन से
आँखों मे
कोई
क्यों
इस कदर चढ़ गया है
सोच -सोच कर हैरान हूँ
यह मुझे क्या हूँ गया है

५- मैने देखा
जागते हुवे
तुहारा
यह एक् सपना
{किशोर }

१६६-कविता-विरह

१-अपनी उगलियों को मारोडाहोगा
फ़ीर गिन कर देखा होगा
फ़ीर नजरे उठा कर
पास आ गयी रात के
वीरानेको -
कमरे तक
फ़ीर दिल तक
आने से रोकने के लीये
उठ कर
खिड़की को बंद किया होगा
हर करवट मे
एक् हाथ से
बिस्तर पे उसे धुडा होगा
यही सोचते -सोचते
की -
आज -क्या बात हो गयी
उनसे आजही क्यों --?
शेष मुलाकात रह गयी

क्या उसका भी यही हाल है
ये रात है की -
दरदो की बारात है
इस प्रथ्वी मे ही रह रहे है हम
पास -पास दीवान के
शहर मे -
सो रहें है हम
फ़ीर भी मेरे दिल को
ये कांटा क्यों चुभा -
शायद उसके मीठे बोल सुने बिना
यह
मन मचल रहा है
यह कैसीआग है
जिसमे उसकी भी देह
मेरा भी तन -
जल रहा
छूकर कभी
उसे देखूंगा ....
डर लग रहा मुझे
मै कही रख न हो जाऊ
क्या मै -
अब लपटों की चिता पर सो रहा
{किशोर }

दिल के वास्ते

१-शोखी की हद पार कर जाए
कोई दीवाना -
उसे रोका नही करते
किसी की तकदीर मे
बडी मुश्कील से भेजते है
एक् दीवाना -
इश्क के फ़रिश्ते ..!
२-मेरी आरजू है की
तुम
चुपचाप बहती रहो
साहील सा देखता रहूँ
तुम्हें ..
भंवरो से उबरते -उबरते

३-मालूम है जिन्दगी मे
औरभी फर्ज है
जीवन के रास्ते
पर इश्क से ऊँचा
काम नही -
इस दिल के वास्ते
{किशोर }
-शोखी की हद पार कर जाए
कोईदिवाना -
उसे रोका नही करते

किसी की तकदीर मे

रविवार, 17 मई 2009

Tatpry.: हिन्दी साहित्य मंच " कविता प्रतियोगिता सूचना "

Tatpry.: हिन्दी साहित्य मंच " कविता प्रतियोगिता सूचना "

हिन्दी साहित्य मंच " कविता प्रतियोगिता सूचना "

प्रति

संचालक

हिन्दी साहित्य मंच "


hindisahityamanch@gmail.com ।

आपके द्वारा प्रेषित "कविता प्रतियोगिता सूचना "के आधार पर मै अपनी एक कविता आपको प्रेषित कर रहा हू
मेरा सक्षिप्त परिचय
नाम -किशोर कुमार खोरेन्द्र पता -मुंगेली -kishork630@gmail.com उम्र -५४ वर्ष व्यवसाय -रिटायर्ड {स्टेट बैंक अधिकारी }

कविता --शीर्षक -तुम माँ हो ..
तुम्हारा मन पारस है

और तन सोना
उदार हिरदय मे है
भरी
सबके लिए करूणा

मोतियों सा चमकता है तुम्हारा -मुस्कुराना

तुम्हारे प्यार के आठवे रंग
को आत्मसात कर
इन्द्रधनुष के रंगों की भी बढ़ जाती है शोभा -

हर रोज एक गाय आ जाती है
अपने माथे पर
तुमसे तिलक लगवाने
चीटियों की लाइन लग जाती है
तुमसे -मीठा स्नेह पाने
बिल्लियाँ भागती नही -
चाहती नही वे भी साथ तुम्हारा खोना
जब तक नही देख लेता तुम्हे
टॉमी ॥!
जारी रहता उसका रोना

सब्जी वाला ,दूध वाला या भिखारी
देख तुम्हे कहते देखो
बहना या माँ आई
पर तुम रहती सदा ध्यान मे
प्रकाश पुंज से तुम भीतर -बाहर घिरी हुई
उत्सुक
सदा
सुनने -सबकी वेदना

तुम बाटती
सबको भर -भर
प्रेम -प्रसाद का एक एक दोना
तुम नही रहती
तब
बच्चो को घर लगता सुना
तुम्हे देख कर भूख मिट जाती
तुम्हारे हाथो से बने भोजन
मे होता है -स्वाद दुगुना
तुम घर हो तुम माँ हो
तुम्ही हो
हम सबकी नीद के लिए
कोमल ममत्व भरा बिछौना
तुम्हारा मन पारस है
और तन सोना -
प्यार से लेकिन कभी -कभी
मेरा नाती कहता
तुम्ही हीरा ,और मेरी चांदी ..हो..ना
{किशोर कुमार खोरेन्द्र }
मै प्रमाणित करता हूँ की उपरोक्त कविता मेरे द्वारा लिखी गई है एवम मौलिक है
किशोर कुमार खोरेन्द्र


भेजने की तारीख़ -१७-०५-०९
स्थान -मुंगेली

कतरा कतरा शायर हू

१-कतरा कतरा हसीं शायर हू
कतरा कतरा तेरा ही प्यार हू


२-जर्रा जर्रा टुटा हुवा तारा हू
तू पूर्ण आत्मा मै अधूरी काया हु

१६३-शैदाई हू

१-तेरा इन्तजार भी ,एक शीशा -ऐ -गिलास है
इसमे भरी लबालब सिर्फ़ विरह की प्यास है


२-तू कभी न आयेगी यह मुझे ज्ञात है
आ गयी अगर किसी रोज ,क्या बात है

३-महकता हूवा यह प्यार है

हर साँस मे तू मेरा संसार है

४-पानी पर खीच कर प्रेम की गहरी लकीर

कर गये मुझे सलाम
अब कहते है मिटा दो उस लकीर पर
लिखा हूवा उसका नाम


५-जान ले यह की मै तुझ पर ,सदीयों से फिदाई हू
जाना न मुझे छोड़कर मै ही तेरा शैदाई हू

{किशोर कुमार खोरेन्द्र }

शनिवार, 16 मई 2009

कविता -

१-मै अगरबत्ती के
धुवे सा -उड़ता ही रहता हू

तुम्हारे खयालो से

महकता ही रहता हू

२-मुझे मालूम है
तुम

सदेह नही आ पाओगी
फ़िर तुम्हारे -स्पर्शो को
तन्हाई की किताब मे
छपे शब्दों सा पढ़ता रहता हू

३-मै एक गीत हू
तुम्हारे ह्रदय मे -सस्वर वो गीत संचित है
मेरा भी मन -मौन होकर सुन रहा
तुम्हारे मौन को -यही क्या प्रीत है


{किशोर कुमार खोरेन्द्र }

कतरा -कतरा

१-pyar intjar ka hae dusra nam

jb milna

mujhse ,agar
mr jau to vapas bula lena mujhko


२-तू मुझे मेरी अमानत सौप दे

तू मुझे मेरी मोहब्बत सौप दे

कतरा कतरा

१-pani par koi prem ki gahari lakir khich kr chala gaya kar salam

chitthi aayi hae mitake batao to jane lakir pr likha vo mera nam





२-vkt lagega milane me

ajnabi par etbar karne me

pa jane do aam ko
virah ki amrai me

bahut mitha lagega tb
use khane me

मुक्तक

दू हाथ बाडाये भावी

तुमसे

जडी ह्रदय छोपाई

पावो स्वर्गेर चाबि

हेसी ,
भाल बसे
कोजागरी अभिनय
ऐ ई जत भाल लगा

जेते ऋतू ,जेई तिथि ,जे जीवन ,जेई मृतु रीती
म्हैतिहास एसे एखानाओ जानेनी जर माने

सवार जीवन ऐ भावेई जेन चलाछे नियत मापा
मनेर जनला भेजिए दिलेइ ,सब पडे जाय चाप
{संकलन कर्ता

शुक्रवार, 15 मई 2009

१५९-कविता -प्रेम का गुपचुप अहसास

१-देखो तो

तुम्हारे रुमाल मे

मै कही
तह करके
रखा हुवा तो नही हू
तुमने इत्र भी नही छिड़का है
फ़िर भी रुमाल
मेरे पसीने की तरह महक रहा है

२-तुम्हारे पर्स मे
मेरी फोटो की जगह
सिर्फ़ नोट है
फ़िर भी मुझे
खोये हुवे एक सिक्के की तरह
क्यो खोज रही हो

३-तुम्हारी चप्पले बार -बार
भीड़ से अलग
सुने एकांत मे क्यो
जाना चाह रही है
कही वहा
एक -वृक्ष के नीचे
छाँव की जगह मेरा साया तो नही है

४-तुम्हे दर्पण मे
मै
क्यो दिखाई दे रहा हू
कही तुम्हारी सूरत ने
रत -भर मे
अपना मुखौटा
उतार तो न्हीदिया है

५-एक रंगीन पंख ने
समीप आकर
तुम्हारे कानो को सहला दिया है
तुम्हे -प्यार से उसने पता नही क्या कहा है
की तुम्हारे गाल -गुलाबी हो गए है

६-तुम मंद -मंद मुस्कुरा रही हो

एक पुरानी धुन मन ही मन -गुनगुना रही हो
तुम्हारा हर्ष देख कर
फूल भी मुस्कुराना भूल सा गया है

{किशोर कुमार खोरेन्द्र }

१५८-एक कविता

ek hinhdi kavita

mae bar -bar kahata hu
aur kahata rahunga
ki -

mae tumse prem karata hu
tum
sundarata ki apsara ho
mae
din rat
yhi kahata rahunga

aur apni
antim sans me

bhi tumhare nam

ko
ek lambe mantr ki

tarah

bhar kar -is jg se
bida ho jaunga

{kishor kumar khorendra }

मनोरम काव्य

१-आप्नेर मूर्ति
काछे
चुप करे आछे {अपनी मूर्ति के पास चुपचाप खड़ी है }

२-नि:शब्द ,निर्जन पृथ्वी जेन {निस्तब्ध निर्जन पृथ्वी जैसी लगती है }

३-हेसुन्दरी

४-महाचेतनार गोल गवाक्षे {महा चेतना के गोल गवाक्ष से }

५-मै तुम्हे नित्यी बसे देखि {मे बैठ कर नित्य तुम्हे देखता हू }
६-जैसे किसी स्मरने {जैसे किसी याद मे }

७-ते {तुम}
८-खोयी हुवी हो

९-से कोथाय {वह कहाँ है }

१०-जिसे तुम प्यार करती हो

११-क्या वह श्वेत शंख है

१२-जिसकी मधुर आवाज
१३-मे तुम

१४-shankha सी -

१५-इस दुनिया के

१६-सैकते एसे {बालू पर }

१७-एसे हीचुप चाप जैसे पडी हो

१८-तोमार दइके ताकाले {तुम्हारी or देखते ही }

१९-उत्तरेर जेन आभास पाई {मानों उत्तर का आभास मिलता है }

२०-हे सुंदरी

२१-तुमि एई कवी {तुम इस कवी की }

२२-मनोरमा काव्य {सुंदर कविता हो }

{किशोर कुमार खोरेन्द्र }
इससेमै अपने आंसुवो को
पोंछ लूँगा


गुरुवार, 14 मई 2009

महक रही हो

वर्षा की हलकी बूंदों से
भीगी हुवी मिट्टी मे
तुम
सोधी सोधी
खुशबु सी -महक रही हो

तुम्हे स्पर्श कर
मुझ तक पहुची
शशी किरणे
और चमक रही है
तुम्हारे अधरों को
चूम कर लौटी
लहर को
नदी ने -सुरक्षित
मुझे लौटा दिया है
देह रूपी साडी
के
नित बदलते रंगों
से मेरा मन
रंग गया है
यह सच है
मत कर शंका
ओ ,मेरी शंखा

{किशोर कुमार खोरेन्द्र }

१५४-राहगीर

नगर के जगमगाते उजाले
की रात
की लम्बी सुनसान
सडको
पर -एक राह गीर से
कोई खम्बा टकरा न जाए
भीड़ के कारन ट्रेन पर न चढ़ पाया
यह राह गीर
अपनी यातना की सारी व्यथा
आज
थकी हुवी रात से कही कह न जाए

कोई तो जगा होगा
आधी रात
जीवन के इस प्लेटफार्म मे

कहानी उसकी जिन्दगी की
सुबह तक अधूरी न रह जाए

कुछ लोग नगे फर्श पर

चादर ओढ़ कर सोये है
कुछ लोग लगता है
सपनो मे खोये है
कोईन्ही यहा सुनने वाला
इस ठण्ड मे
लगता है राहगीर के दर्द भरे
शब्द
कही
बर्फ बनकर फ़िर हवा मे न घुल जाए

{किशोर कुमार खोरेन्द्र }

बुधवार, 13 मई 2009

अनगिनत ,अन्नत सितारे और सागौन वृक्षो के पास

-अनगिनत ,अनन्त सितारे
रेत पर
पद-चिन्ह
छोड़ जाओ
कुछ दूर चल लूंगा
लहरों को
अपना नाम -पता
बता जाओ
ईसी धरती मे रहता हू
तुम्हें
धुड लूँगा
छांव मे
बैठी रह गयी है
तुम्हारी परछाई
बैठ कर धुप सा
तुम्हें
निहार लूंगा
अनगिनत ,अनन्त सितारे
जड़े है
तेरे आचल मे
जल बनकर उसे
नदी सा बिछा लूँगा
तुम्हारे प्रतिबिम्ब
को तुम मानकर
तुम्हें
न देख पाने का दर्द भुला लूँगा
मालूम है
फूल बनकर
तुम्ही खिली हो
मंजिल हो मगर
राह मे मेरे
पग -डंडियों सा
तुम्ही आ मिली हो
तुम्हारी बांहों के
अ -दृश्य घेरे से
घिरा हुवा होकर भी
तलाशता हू
मै
अपने स-दृश्य
एक् चेहरा
तुम्हारा
{किशोर कुमार खोरेन्द्र }


सागौन वृक्षो के पास
१-मै नही
सड़को पर घूम आती है
मेरी चप्पले
झोला ले आता है
बाजार से खरीद कर
सब्जी
लोगो को देखता
नहीं
मेरा काला चश्मा
कपडे की जगह
कभी -कभी
मै टंगा होता हू
धुप मे सूखता हूवा
लोग मुझे नही -
पहचानते है मेरी कमीज को
मै
एक
पुरे आदमी की तरह
कभी भी
लोगो के सामने नही आ पाता
इसलिए
हर मित्र की जेब से
मै
बरामद किया जा सकता हू
हर बार -अलग -अलग रूप मे



२-दोनों हाथ पडे रहते है
दफ्तर मे फाईलो के पास
किसी की आँखों के आईने ने
मेरा चेहरा चुरा लिया है
गाँव से आए पिता
के पांवो को छूने से
कैसे मना कर देगा मेरा कोट ॥?
पडोसी को शायद मालूम नही
की
गुडहल के फूल की
पंखुरीयो
सा .....
मै ही गिर जाया करता हू
अक्सर
अपने आँगन से
उसके आँगन -द्वार
मै ठहरा हूवा शरीर हू
इसका अहसास कभी नही होता मुझे
लगता है मेरा कद मेरी देह से बडा है
किसी डिब्बे मे बैठा हवा
मेरा शरीर भागता चला जाता है ...
रेलगाडी के साथ
और .....
.मै .........
छूट जाया करता हू
प्राय:
किसी न किसी
जंगल मे उगे हुवे
हजारो -सागौन वृक्षो के पास
{किशोर कुमार खोरेन्द्र }

तुम माँ हो

१-~Rashmi.rathee~:

wah bahut khoob....




२-Mangala:

wah! bahot khub! aap strike prati bahot aadar rakhate hai,aur uske har gunoko barkaise dekhte hai...vo sab aapaki kavitame pratibimbit होता




३-मेरा मुझ में:

तुम्हारे प्यार के आठवे रंग
को आत्मसात कर
इन्द्रधनुष के रंगों की भी बढ़ जाती है शोभा -



५-मेरा मुझ में:

kishore ji adbud bahut achchi,
isse pyaara maa ka chitran shayad nahi ho sakta...
aapne in shabdon mein jaise meri apni maa ka chitr bana diya mere mastishk patal par....
dhanyawad....
god bless u

तुम माँ हो

१-Gopal:

बेटा बन जो पिशाच ,
ले काट माँ का कलेजा निकाल,
तो भी उस कटे कलेजे से ,
स्वर निकलेगा खुश रहो लाल !!




२-Gaurav Vashisht:

kya baat hai sir
sundar, bahut hi सुंदर

















तुम माँ हो

१-rekha:

unkel ji, ye kavita vakai me bahut achchhi है






२-Jaya :Tum Ko Na:

so beautiful poem....no word 4 xplain







३-bhavana:

hi good morning dear, thanks for the lovely poem, sorry for late reply. good day. om namah shivay






४-Sheela:

hare krishna..bahut sundar...





६-SHANKHA PAULA:

lekin ye bhi tow aap ki hi protibha hain,,,,nahi tow sabne likhna sikh gaya hota







७-Anil:

नमस्कार सर जी ............ इस संसार माँ से बड़ा कोई नहीं है !







९-Sripad Rao:

hundred teachers are euql to mother।she is a living god.veri nice poem friend thank u












सपने की इच्छा

सपनो की नींद मे
तुम
केवल एक सपने की तरह

जागती हो
क्योकि
सपनो की हर इच्छाए

तुंरत पुरी होजाती है

{किशोर कुमार खोरेन्द्र }

मंगलवार, 12 मई 2009

१५३-कविता -लहरों ने

१-लहरों ने

तुम्हारे आँचल की तरह मुझे

छुवा

२- अब मै सोच रहा हू
कि

देह रूपी इस नाव को
इस -प्रेम -तरंगो के हवाले कर दू

३-मंझधार तक
पहुच जाऊ -जहा पर तुम

मेरा इंतजार कर रही हो
निर्वसना सी

४-तुमने अपनी आत्मा
से
देह का कपड़ा भी उतार दिया है

५-मुझे भी
अपने चमत्कार से
या -प्रभाव से
आवरण -विहीन कर देना
तब शायद
दो भंवर
आपस मे एकाकार हो जाए

हम दो आत्माए
एक साथ तल्लीन होकर
लीन होजाये

{किशोर कुमार खोरेन्द्र }

१५२-कविता -जल और प्यास

१-मै तुम्हारा मन हू

अनेक शब्दों के बादलो से बनाता चित्र हू

या

अनेक चित्रों के अक्षरों से ,बनाता एक शब्द हू

२-तुम कभी बादलो को बाहों मे भर लेती हो

या

तुम कभी मुझ एक शब्द को पुकार लेती हो

३-तुम्हारी पुकार के प्रतिउत्तर मे
इस जग के जंगल से
कोई एक वृक्ष तुम्हे

अपनी टहनियों से -पत्तियों की तरह तोड़कर

एक चेहरा नही दे पाता

४-तुम्हारे चित्रमय सपनो से
लाख मांगने पर भी
एक भी स्वप्न अपने दायरे से बाहर
निकाल कर

तुम्हारे जागरण के लिए

तुम्हे

एक टुकडा मिश्री जैसा स्वप्न नही लौटता

५-और इस तरह

तुम्हारे पास

या
तो -बिना आकृतियों वाला शब्द रह जाता है

या

फ़िर -बिना शब्दों की एक आकृति रह जाती है

लेकिन क्या ...?

तुम मेरे लिए
और
मै तुम्हारे लिए

साकार शब्द है

यदि है ...
तो हममे से कोई एक जल है
और हममे से कोई एक प्यास है

इसके बाद शायद कोई तलाश शेष न हो ।

{किशोर कुमार खोरेन्द्र }

१५०एक सुंदर लड़की

एक सुंदर
भोली-भली लड़की
इस हुगली नदी के हावडा पुल पर

कई बार
आकर
जाकर -बडी हुवी है
पुल जीतनी लम्बी
अपनी इस
हजारो बार की यात्रा मे
शालीमार से वेलुर मठ तक के
बहते जल को अपनी आँखों की
अंजुरी मे भरकर
उसने
कई बार पीया है

अब
वह लौटते हुवे नाविकों से
पूछती है
समय की नदी मे
प्रवाहित
हो चुका उसका बचपन
कही उनके जालो मे
सोन -मछरी
की तरह -फसकर लौट तो नही आया है
वह उस युवती को भी
भीड़ के इस महा -नगर मे
तलाशती है शायद
उसके सपनो से मुलायम टूटे हुवे पंख ही मिल जाए
और
वह फ़िर
अपनी माँ
औए पिता की आँखों से
देखना शुरू करे
हुगली नदी को
उसके विस्तार को
हावडा के पुल पर चलते हुवे
उसे
फ़िर देखे बेलूर मठ और शालीमार

{किशोर कुमार खोरेन्द्र }

सोमवार, 11 मई 2009

१४९-तुम माँ हो ..

तुम्हारा मन पारस है

और तन सोना
उदार हिरदय मे है
भरी
सबके लिए करूणा

मोतियों सा चमकता है तुम्हारा -मुस्कुराना

तुम्हारे प्यार के आठवे रंग
को आत्मसात कर
इन्द्रधनुष के रंगों की भी बढ़ जाती है शोभा -

हर रोज एक गाय आ जाती है
अपने माथे पर
तुमसे तिलक लगवाने
चीटियों की लाइन लग जाती है
तुमसे -मीठा स्नेह पाने
बिल्लियाँ भागती नही -
चाहती नही वे भी साथ तुम्हारा खोना
जब तक नही देख लेता तुम्हे
टॉमी ॥!
जारी रहता उसका रोना

सब्जी वाला ,दूध वाला या भिखारी
देख तुम्हे कहते देखो
बहना या माँ आई
पर तुम रहती सदा ध्यान मे
प्रकाश पुंज से तुम भीतर -बाहर घिरी हुई
उत्सुक
सदा
सुनने -सबकी वेदना

तुम बाटती
सबको भर -भर
प्रेम -प्रसाद का एक एक दोना
तुम नही रहती
तब
बच्चो को घर लगता सुना
तुम्हे देख कर भूख मिट जाती
तुम्हारे हाथो से बने भोजन
मे होता है -स्वाद दुगुना
तुम घर हो तुम माँ हो
तुम्ही हो
हम सबकी नीद के लिए
कोमल ममत्व भरा बिछौना
तुम्हारा मन पारस है
और तन सोना -
प्यार से लेकिन कभी -कभी
मेरा नाती कहता
तुम्ही हीरा ,और मेरी चांदी ..हो..ना
{किशोर कुमार खोरेन्द्र }

१४८-तुम सतरूपा

१-लहरों मे से एक लहर ने मुझे
तुम्हारे आचल की तरह
छू लिया
तुम्हारे स्पर्श की आंच से पिघलकर
मै एक चट्टान
शायद जिसे
तुम्हारा ही था इन्तजार
अब
बालू के कणों की तरह
तुम्हारी अन्जुरीमे शेष रह गया है
३-मैने तुम्हे यथार्त के तट से
हाथ पकड़कर
अपने स्वप्न के
रंगीन चलचित्र मे
खीच लिया है
४-मै असत रूप अणु -देह हू
और
तुम सतरूपा
मेरी आत्मा हो

{किशोर कुमार खोरेन्द्र }

१४७-मायावी संसार

१-वो वृक्ष मेरा
क्या दोस्त है
जो बिठाकर मुझे अपने पास
मुझे देता -पंखुरिया ,
हरी पत्तिया
झुकाकर अपनी टहनिया
सहलाता मेरे सिर और बाल
उसके छाँव मे बैठा
कभी टिकाकर
तकिये सा उसका तना
सोचता हू यह वृक्ष भी किसी व्यक्ति सा
हो पायेगा मेरा अपना

२-सड़के
गलिया
सागर के तट
दफ्तर
खाली सीट -बसों के
या
मेरे इस शहर की लम्बी रेल -गाडीया
सब बुलाते
लेकिन शाम को घर लौट कर
यही लगता है
मिलना -जुलना था बस्
जैसे
दिन भर की नीद मे
घूमता रहा होऊ -बन एक् सपना

३-अख़बार मुझे पढने लग जाते है
घर मेरे भीतर रहने लग जाते है
जैसे जग मे मुझे रहना था
केवल अपने आप से ही शायद मिलना था
पर
जग की माया अपरम्पार
मुझमे आ रहता पूरा संसार
दुड़ता खुद को -
बिना जाने अपनी पहचान


{किशोर कुमार खोरेन्द्र }

१४६-मेरे प्यार केबदले

१-मेरे प्यार के बदले
तुम मुझे
अपने मन मे रख लो
तुम्हारे अश्रु सारे पी जाउंगा
निहार लूँगा मै तुम्हे
जब देखोगी तुम दर्पण
तुम मुझे अपने नयन मे रख लो

२-मेरे प्यार के बदले
तुम मुझे अपने स्मरण मे रख लो
तुम्हारी कल्पनाओ मे स्मृतियों का रंग बन जाऊँगा
आह्लादित हो जाउंगा तुम्हारी गरीमा से
तुम मुझे अपने शरण मे रख लो

३-मेरे प्यार के बदले
तुम मुझे अपने सपनो के आँगन के कण -कण मे रख लो
बिछुड़ने न दूंगा प्रणय-पल को स्वप्न मे भी
मिट जाऊंगा मै भी संग तुम्हारे
तुम मुझे अपने निज समर्पण मे रख लो

४-देह कहा अमर है
आजमरण ,कल नूतन बचपन है
मेरे प्यार के बदले
हे प्रिये -
तुम मुझे -अपने साथ भावी -
अजन्मे
शाश्वत -नव अवतरण मे रख लो

५-मै हूकुछ -कुछ अधमी
तुम पवित्र परम साध्वी
जल दूषित हू परन्तु
संग तुम्हारे पावन गंगा हू
हे प्रिये
एक बूंद सा मुझे -अपने आचमन मे रख लो

६-तुम -...हो ...
धरती पर भागती बादलो की प्रतिछाया
तुम ...हो ...
यह प्रकृति और नित बदलती माया
दृश्य तुम
और मै दृष्टा
मेरे प्यार के बदले
मुझे अब
एक साक्षी -विरह मिलन का
हरदम
रख लो
{किशोर कुमार खोरेन्द्र }

१४६-मेरे प्यार केबदले

-मेरे प्यार के बदले
तुम
मुझे
अपने मन मे रख लो
तुम्हारे अश्रु सारे

१४६-मेरे प्यार के बदले

१४५-

छपी एक कविया सा
मै
अखबारों मे
दीखता शायद हू
पर
भीतर ही भीतर
मन मे
अमृत सी
रिसती है कविता
इसीलिए मै आदमी ...?
इस शहर मे -अब तक ,जीने लायक हू
{किशोर कुमार खोरेन्द्र }

१४४-सदीयों पुराना मित्र

मेतुम्हारे माथे की चिंतित बिंदिया हू
तुम्हारे ओठो की ,विस्तृत मुस्कराहट हू




तुम्हारी आंखोके जल में तैरता हुवा खुशियों का पल हू

तुम्हारे मन में बसा एक् उत्तम पुरुष हू
जिसकी बाहों में तुम सशरीर समायी हुवी
निशचिंत
रहती हो



अपने अंतर -गृह में
अविरल बहते प्यार के आगोश मे
निडर रहती हो



मै तुम्हारे जुड़े मे
अटका हुवा
एक् सभाग्य्शाली
गुलाब हू





तुम्हारी चुडीयो की तरह बोलता हू
पायल की तरह संग चलता हू




मै दरअसल
बचपन से तुम्हारे संग हू




तुम नारी हो
मै
प्रतिरूप
तुम्हारा पुरुष सा अर्धांग हू

दुःख को देह की देहरी
पर छोड़कर
मुझसे केवल
सुख की बाते करती हो मै ही तुम्हारा मनमीत
अदृश्य
निराकार
पर अब
सचित्र
व्ही सदियों पुराना
मित्र हू {किशोर कुमार खोरेन्द्र }

रविवार, 10 मई 2009

मित्र

Search for "girish" in my friends
"girish" in my friends list

Girish Joshi
"मुज़ से अनजान मुज में रहता है, कैसा इन्सान मुज में रहता है| मैं तो मुश्किल हूँ जांक कर देखो, मुज़ से आसान मुज़ में रहता है|"
September 1
jogigiri@yahoo.co.in

शनिवार, 9 मई 2009

१४३-घर ही है -असली तपोवन -

कभी मै ...
चश्मे या रुमाल सा -घर में ही खो जाया करता हू
सोफे या दीवान पर -किताबो सा चिंतित ,पडा रह जाया करता हू
अखबार के दुखी पृष्ठों पर -छपे खबरों सा ,कभी बिखर जाया करता हू
और तुम ...
मुझे धुड लिया करती हो ,समेट लिया करती हो
जन्म से मृत्यु तक की इस यात्रा में
मै कितना सच हू या कितना झूठ ...?
अब तक जान नही पाया
परन्तु
मानों ,मै दीपक हौऊ ,और बुझने से मुझे बचाने में लगी तुम्हारी उंगलियों .सा
मै भी
नुकीली लौ की आंच को -चुभता हुवा -महसूस कर रहा होऊ
हमेशा प्रेम के इस आग को -
निष्काम भाव के इस तपन को -
प्यास लगाने पार -तुम और मै -
सदेह ...
अमृत की तरह पी जाया करते है
टस से मस् नही होने वाले -
एकांत के ..
ऊँचे पहाडो के शिखर से -
जंगल से भी ज्यादा घने -अकेलेपन के दर्द से -
सूनी औए मौन -पटरीयो पर ...
ट्रेन की तरह दौड़ता हुवा ...
प्राय:
उस स्वप्नमय बीहड़ से -घर लौट आया करता हू -
तुम्हारे पास
मुझे मालूम है घर ही है -असली तपोवन -
स्नेह ,ममता ,आस्था --को पाकर
साकार खिलते है -भविष्य के सुमन
प्रेम है -
स्वजन के समक्ष -अपना ............?
एक् सजीव
मानसिक
परम आत्म समर्पण -
स्व का -अंहकार का विसर्जन
{किशोर कुमार खोरेन्द्र }

बुधवार, 6 मई 2009

१४२-ठीक मृत्यु के पूर्व

ठीक मृत्यु के पूर्व

मुझे प्यास लगी थी
मै
गंगा -जल नही
तुम्हें
पीना चाह रहा था

नीद आ रही थी
मै
तुम्हारी गोद में
सर रखकर
गहरी नींद
सोना चाह रहा था

जैसे -कुंवे में बाल्टी सहित
रस्सी
छुट न जाए
ईस डर से
मै
उसकी हथेली को
कस के पकडे हुवे था

मेरी आँखों के सामने
एक् मंदीर की धुधली छवी के भीतर
माँ की मूर्ती की जगह
तुम
खडी हुवी
नजर आ रही थी

अपनी इस जीवन यात्रा में
मैने तुम्हारे सिवा
कुछ
देखा ही नही था

आकाश और धरती
के बीच
स्थित हर पृष्ट पर
तुम्हारा ही
चित्र देख रहा था

देह के भीतर से
अब
बाहर आ रही
अंतिम साँस में
मैने जाना
कि-
जीसे मै तलाशता रहा था
जिन्दगी -भर
वह -
ईश्वर तो तुम ही थी
{किशोर कुमार खोरेन्द्र }

१४२-दीप -शिखा सा वरण करे

दीप -शिखा सा वरण करे '

१-उसकी आँखों में प्यार का -नीला आसमान है
स्नेह के -हलके पीले रंग
वात्सल्य के -उज्जवल श्वेत रंग
के दिव्य लिबास को पहनी हुवी
वह
पवित्र माँ
मेरी
कवीता है
२-वह
स्वयं
टिमटिमाते सितारों के
प्रकाश सी झिलमिलाती
एक् रजत -आईना है
३-गर्म काफी को
पीने के पश्चात
महसूस हुवी -स्फुर्ती
की तरह
उनका -पवित्र दर्शन है
४-सुबह सैर को निकली
ताजी हवाओ की तरह
उनका -मीठा
शीतल स्पर्श है
५-वृक्ष की शाखाओं पर
घनी पत्तीयों के बीच
बिंदु -बिंदु -अंतरालों को
पार कर
आती हुवी
सूर्य -रश्मियों कि तरह
उनका
मेरे शीश पर
स्वर्णिम आशीर्वाद है
६-आकाश पर उभर आये
भोर के महा -दृश्य के सदृश्य
उनकी भव्यता के व्यक्तित्व को
अभिव्यक्त करने के लीये

मेरे पास
एक् कोरा कागज सा
साफ मन है

उनके
सदैव
चीर -स्थायी
सौन्दर्य की लालिमा के बखान के लीये
मेरी कलम में
वह
शाश्वत
स्याही का रंग है
८-फ़ीर भी प्रयास -रत् हू
९-माँ ..!
त्रुटी -यो को क्षमा करे
मुझे अपने
समक्ष
प्रज्वलित
दीप -शिखा सा
वरण करे /
{किशोर कुमार खोरेन्द्र }

१४२-दीप -शिखा सा वरण करे

-उसकी आंखो मे
प्यार का
नीला ...आसमान है
-स्नेह के -हलके पीत रंग
वात्सल्य के -उज्जवल शवेत रंग
के daevviiy

मंगलवार, 5 मई 2009

१४१-कविता -सुकरात और मीरा ने जहर को नही पीया

१-जिदगी ख़ुद
समझ मे नही आने वाली
एक
अंतहीन
लम्बी कविता है
२-इसलिए
मुझे
कटघरे मे खडा कर
क्यो पूछ रहे हो
मेरी कविता का अर्थ क्या है
३-मेरी कविता मे

नदी की तरह तुम भी हो सकती हो
या
तुम्हारी तरह एक नदी भी हो सकती है
४-मै छंद -रहीत
स्वतन्त्र काव्य हू
केवल भावः हू
विचारों का प्रवाह हू
५-सुकरात और मीरा ने जहर को नही पीया
जहरीले प्यालो ने -उन्हें पी लिया था
६-कहा से आया ,कहां जाना है
न जाती ,न धरम ,-न मेरा कोई ठिकाना है
एक
लापता
पगदंडी सा मै
स्वयम तलाश रहा हू
सदीयों से ....
अपना वजूद
अब बताओ -
कहां है तुम्हारे पास
मेरे गुनाहगार ...
होने का सबूत
७-अमृत -मयी कवीता से
जहर को अमृत बनाना है
बरसो से
हमें
सत्य को ....
घेरते आए कटघरे को
अब
घिर जाने दो ....
सवाल ...?
मै तुम
हम करेंगे .....
उत्तर ...?
अब
इस घमंडी
बेखौफ
निशचिंत
कटघरे को देने दो .
{किशोर कुमार खोरेन्द्र }

सोमवार, 4 मई 2009

१४०-लौट आओ ..मै ही तुम्हारा देश हू

१-इतिहास के ठहरे हुवे
चट्टानों को
ऊँचे पर्वत की तरह
खड़ा कर
२-परम्परा
के जल को
गहरी नदी मे भरकर
३-सभ्यता की इमारतो को
महानगर मे बसाकर
४-मै
एक खेत
धान सा
ज्वार सा
अब भी उग रहा हू
धतूरे
बबूल
कनेर
कपास
पलास
सा अब भी
खिल रहा हू
५-फसल की जडो मे
भरा रस
प्रीत हू
कृषको की थकान को दूर भगाता
सुसंस्कृत
लोकगीत हू
६-इतिहास को ठहरे रहने दो ,
परम्परा को मंथर गति से बहने दो
सभ्यता को गगन चूमने दो
७-मै
गंगा -जल रहित
शुष्क रेत नही
दूध सा धवल
करुणामयी आँख सा सजल
वेद सा पुरातन
परीश्रमी

पवित्र पसीने से तर

माटी

से भरा खेत हू
लौट आओ
मै ही तुम्हारा देश हू

{किशोर कुमार खोरेन्द्र }

रविवार, 3 मई 2009

१३८-अपना मित्र नेक

हम सब है एक्
पर
सबमे
मै स्वयम ही
बन पाया हू
अपने लीये
अपना मित्र नेक
हंसता हू मिलता हू सबसे
क्यों सदा रहकर निर्लेप ...?
फ़ीर लौट आता हू
अपनी ही काया मे
गुफा मे
देख कर
सुख-दुःख के रंग अनेक {किशोर कुमार खोरेन्द्र }

शुक्रवार, 1 मई 2009

१३६-स्वपन के भीतर और बाहर

१-आसमानी साडी के
हल्के केशरिया रंग के
आँचल से
ढके
तुम्हारे स्वर्णिम माथे से
सुबह के सूरज की तरह
झांकती
लाल -गोल -बिंदिया
छितिज की तरह
मुझसे दूर भागती है
मै दौड़ता हुवा
अक्सर
तुम्हारे पास खडे
गहरे हरे रंग के पत्तो से
आच्छादित
वृक्ष तक ही
पहुच पाता हू
सपने के भीतर यही होता है
उस वृक्ष से टपके सागौन के
पत्तो की
महीन -नसों मे
शायद तुम्हारे द्वारा बुना गया
एक् मानसिक मधु-स्मरण छुट गया हो
एक् प्रेम -पाती सा मेरे नाम
२-सपने से बाहर
जागरण मे
चलते -फिरते
आँगन मे
बहते हुवे
मेरे एकाग्र -चित्त चिंतन मे
मुझे लगता है
तुम
मेरी खोयी हुवी बांसुरी हो
और मेरे अधर
ब्याकुल है ,आतुर है
फ़ीर डूबने को
उसी गोकुल -वृन्दावन
सी मीठी तान मे
तुम राधा मै किसन
और बैठे हो -यमुना तीर
एक् साथ मे ॥
अक्सर यही होता है
स्वप्न के भीतर
या स्वप्न के बाहर
हर याद मे
{किशोर कुमार खोरेन्द्र }

१३६-पुरा दिन पन्ने सा कोरा रह गया

-पूरा