सोमवार, 13 अप्रैल 2009

मन की आंतरीक यात्रा
१-मन के गाँव मे ,
शहर मे ,
मन्तव्य मे ,
मै ही सड़क ,
यात्रा
और
गन्तव्य
होता हू
किसी को पुकारती
बिछोह मे रोती
ब्याकुल सी भावनाओं की
इस
यात्रा
मे
मै कभी भिखारी केभूख साकराहता हू
कभी आकर्षण के वियोग को
पल भर मे
युगों सासह जाताहू
कभी ज्योती के खातिर
बाती सा
जल कर
विशुद्ध

हो जाता हू
फ़िर भी
पानी के बाहर निकली मेरी दो -चार उग्लिया
तट को
या
तिनको को
थामने की आखरी तक कोशिश करती ही है
और
इस यात्रा मे
मै इस तरह
शेष
रह jata हू

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